520 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है जो उस समय अस्पृश्य समुदायों के रूप में मान्य थी। उनमें से चांभार को विशेष रूप से अस्पृश्य समुदाय के रूप में उल्लेख था। मांग का उल्लेख मनु द्वारा नहीं किया गया। ऐसा संभवतः इसलिए होगा कि मनुस्मृति के लेखक को ज्ञात क्षेत्रों में मांग क्षेत्र न हो। परन्तु बुद्ध साहित्य में पर्याप्त प्रमाण है कि उसमें मांतग के रूप में संदर्भित मांग एक अलग सम्प्रदाय के रूप में ऐसे नाम से रहते थे जिसकी जानकारी सभी को थी। परन्तु न तो मनुस्मृति में और न ही बौद्ध साहित्य में महार का एक सम्प्रदाय के रूप में उल्लेख है। इस प्राचीन संकलन में महार का कोई उल्लेख है परन्तु बाद की आधुनिक काल वाली स्मृतियों में भी माहर का एक सम्प्रदाय के रूप में कोई उल्लेख नहीं है। वास्तव में मुसलमानों के आगमन तक किसी को माहर शब्द की जानकारी नहीं थी। इसका उल्लेख केवल एक बार 1100 ए.डी. दयानेश्वरी उल्लेख है। इससे पूर्व महार नाम अस्तित्व में नहीं था। हमें क्या सोचना चाहिए? क्या दयानेश्वरी से पूर्व प्राचीन काल में माहर के रूप में कोई सम्प्रदाय नहीं था? या हम यह समझें कि यहाँ एक सम्प्रदाय था जो किसी अन्य नाम से जाना जाता था? महार नाम का अस्तित्व न होने का मामला श्री विल्सन के विचारों का खण्डन करता है। यदि माहर शब्द की जानकारी नहीं थी तो देश का यह नाम दिये जाने की संभावना बहुत कम है।
दूसरा कारण जो मुझे श्री विल्सन का दृष्टिकोण रद्द करने के लिए प्रेरित कर रहा है, देवताओं से उत्पन्न विचारों पर आधारित है जिसको महार सम्प्रदाय में देखा में जा सकता है। यदि श्री विल्सन की परिकल्पना को सही माना जाए तो हम आवश्यक रूप से इस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि महार मूल निवासी थे और देश जिसे अब महाराष्ट्र कहते हैं में आर्यों के आने से पूर्व से रह रहे। मैं निश्चित रूप से यह अनुभव करता हूँ कि यह निष्कर्ष कई कारणों से अमान्य है, इसके लिए मैं दुख से कहता हूँ कि मैं उन लोगों से पूर्णतया सहमत नहीं हूँ जिनका तर्क है कि माहर इस प्रान्त की मूल-निवासी जाति से संबंधित हैं कारणों की शृंखला में प्रथम कारण यह है कि मैं अपने विचार से सहमत हूँः कि मैं यहाँ एक उल्लेखनीय तथ्य को प्रस्तुत करना चाहूँगा और यह है- जहाँ महार नहीं है वहाँ मराठा नहीं है और जहाँ कहीं महार है वहीं मराठा भी है। यह संबंध केवल संयोग नहीं है बल्कि यह संबंध अभिन्न है और इस प्रमाण से समर्थित है जो समान्यतया नृवंश विज्ञान के विद्यार्थियों द्वारा भी सम्भवतया नज़रअन्दाज कर दिया जाता है। अब यह भली-भाँति विदित है कि मराठों का एक (कबीला) संगठन है। जिसे वे अपना ‘कुल’ कहते हैं और उनका अपना एक देवता भी है। ‘कुल’ और देवता की महत्ता से नृवंश विज्ञान का प्रत्येक विद्यार्थी परिचित होगा। साझा कुल और एक साझा देवता रिश्तेदारी का