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राजनीति में प्रवेश के लिए प्रशिक्षण विद्यालय
सम्पादकीय टिप्पणी
वर्ष 1962 में प्रो. के.टी. शाह द्वारा संसद में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया कि क्या संसद और राज्य विधान सभा के सदस्यों के लिए कोई औपचारिक अर्हतायें होनी चाहिएं। सदस्यों ने अनुभव किया कि कुछ न्यूनतम शैक्षणिक अर्हतायें होनी चाहिएं। परन्तु ऐसे निर्धारण से बहत सारे लोग चुनाव लड़ने से वंचित हो जायेंगे। कानून मंत्री के रूप में डॉ. अम्बेडकर ने सुझाव दिया कि औपचारिक अर्हता की बजाय चुनाव लड़ने वालों को व्यावहारिक ज्ञान एवं उनमें शील होना चाहिए।
उनके भाषण का संबंद्ध सार निम्न प्रकार से हैं :
‘बहरहाल, मैं जानता हूँ कि जिन्होंने उसके प्रस्ताव का समर्थन किया है, उसकी इच्छा को समझ लिया होगा और प्रो. शाह के प्रस्ताव के समर्थन में दिये विभिन्न भाषणों पर भी विचार कर लिया होगा, ऐसा प्रतीत होता है कि कई सदस्य संविधान में उल्लिखित के अतिरिक्त कुछ शैक्षणिक अर्हता जोड़ने के इच्छुक हैं। परन्तु इनमें से कोई भी निश्चित नहीं है। इनमें से किसी ने भी मुझे यह विचार नहीं दिया है ताकि प्रत्याशी कानूनी रूप से चुनाव लड़ने का हकदार हो जाए।
अब मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस सदन की सदस्यता के लिए शिक्षा ही एक मात्र अर्हता नहीं हो सकती। यदि मैं बुद्ध के शब्दों का प्रयोग करूँ तो उन्होंने कहा था कि मनुष्य को दो चीज़ों की आवश्यकता होती है पहली ज्ञान और शील के साथ होना चाहिए, जिसका अर्थ है चरित्र, नैतिक साहस, किसी प्रकार के प्रलोभन से मुक्त होने की समर्थता, अपने आदर्शों के प्रति सत्यनिष्ठा। मैंने प्रो. शाह के समर्थन में सदस्यों द्वारा दिये भाषणों में दूसरी अर्हता के संदर्भ में कुछ नहीं सुना है। परन्तु इसके बावजूद मैं स्वयं भी यह देखने का इच्छुक हूँ कि कोई भी सदस्य इस गरिमामयी सभा में प्रवेश नहीं करें जिसके पास शील पर्याप्त मात्रा में न हो, मेरे लिए उस मूल्यवान अर्हता को सुनिश्चित करने के लिए कोई साधन या पद्धति ढूँढनी अत्यन्त कठिन होगी।