30. केन्द्र और प्रांतों के लिए एक राजभाषा - Page 96

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केन्द्र और प्रांतों के लिए एक राजभाषा
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बम्बई, 15 अक्तूबर, 1948 (एपीआई)

भारत के कानून मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भाषाई प्रांत आयोग को प्रस्तुत अपने वक्तव्य में यह अभिमत व्यक्त किया है कि भाषाई आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन संबंधी मांग को स्वीकार कर लिया जाना चाहिए परन्तु भारत संघ के संविधान में यह प्रावधान होना चाहिए कि प्रत्येक प्रांत की राजभाषा वही हो, जो केंद्र सरकार की राजभाषा है।

डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि केवल इसी आधार पर वह भाषाई आधार पर प्रांतों के गठन की मांग को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं जो भारत की एकता को छिन्न-भिन्न होने से बचाने के लिए आवश्यक है।

डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि भाषा आधारित राज्य ही सामाजिक एकरूपता उत्पन्न करते हैं जो लोकतंत्र के लिए जरूरी है। विषमांगी समाज में लोकतंत्र है। क्यों सफल नहीं हो सकता है क्योंकि सत्ता का निष्पक्ष करने के बजाए इसका प्रयोग अन्य लोगों का अहित करने के लिए किया जाता है।

महाराष्ट्र प्रांत के प्रश्न का उल्लेख करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने उसके आकार और जनसंख्या संबंधी आंकड़े उद्धृत करते हुए कहा कि इन आँकड़ों के अनुसार इसमें कोई संदेह नहीं कि महाराष्ट्र न केवल एक व्यावहारिक प्रांत होगा बल्कि अपने क्षेत्र, जनसंख्या और राजस्व को देखते हुए एक मजबूत प्रांत भी होगा। उन्होंने महाराष्ट्र के भीतर उप प्रांतों के विचार का विरोध किया जो सामान्य समय के दौरान एक स्थायी बोझ और आपात स्थिति में कमजोरी का सबब बन जाएगा।

प्रस्तावित महाराष्ट्र प्रांत में बम्बई को शामिल किए जाने के विरोध में समाचार पत्रों में हाल ही में प्रकाशित लेखों में उठाए गए अनेक मुद्दों का विस्तृत उत्तर देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि महाराष्ट्र और बम्बई एक-दूसरे पर केवल निर्भर ही नहीं हैं बल्कि वे वस्तुतः एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं और इन्हें अलग कर देना दोनों के लिए घातक होगा। डॉ अम्बेडकर ने कहा, कि “यदि आयोग बम्बई को महाराष्ट्र से पृथक करने के तर्क को स्वीकार कर लेता है, तो उसे कलकत्ता को पश्चिम बंगाल से पृथक करने की संस्तुति करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए, क्योंकि महाराष्ट्रीय लोग कम से कम यह दावा तो कर सकते हैं कि बम्बई के व्यापार और उद्योग के लिए उन्होंने पूंजी नहीं तो मजदूर तो दिए ही हैं; जबकि बंगाली तो यह भी दावा नहीं कर सकते।“ ख्1,

1 द सण्डे क्रॉनिकल, दिनांक 17 अक्तूबर, 1948 ***