104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गाड़ीवान हमें अपनी गाड़ी में ले जाने को तैयार हुआ। परन्तु उसने पहले ही यह बात खोल ली कि हमारे लिए गाड़ी की कोचवानी वह नहीं करेगा।
क्योंकि मैं सेना क्षेत्र में रहा हुआ था मुझे कोचवानी करने में कोई कठिनाई नहीं दिखी। जैसे ही हमने उसकी यह शर्त स्वीकार कर ली वह अपना वाहन ले आया और हम सब बच्चों ने गोरेगांव के लिए प्रस्थान किया।
गांव के बाहर थोड़ी दूर पर हमें एक पानी का नाला दिखा। कोचवान ने हमसे कहा कि रास्ते में और कहीं पानी नहीं मिलेगा इसलिए हमें यहीं खाना खा लेना चाहिए। अतः हम गाड़ी से उतरे और भोजन किया। पानी गंदा था और उसमें गोबर और लीद भी मिली थी। इसी बीच गाड़ीवान भी अपना रात्रि का भोजन खाकर वापस आ गया था।
जैसे शाम का अंधेरा गहराया, गाड़ीवान भी चुपके से बैलगाड़ी में चढकर हम लोगों के पास बैठ गया। जल्दी ही अंधेरा इतना बढ़ गया कि मीलों तक न तो किसी दीपक की टिमटिमाती रोशनी और न ही कोई इन्सान दिख रहा था। डर, अंधेरा व अकेलेपन से हमें रोने को मन हो रहा था। आधी रात बीते काफी समय हो गया था और हमें डर लग रहा था। हम इतना डर गये थे कि लगा हम कभी गोरेगांव नहीं पहुंचेंगे। जब हम चुंगी नाका पहुंचे तो हम गाड़ी से कूद पडे़। हमने नाकादार से सवाल पूछा कि क्या आस-पास कुछ खाने को मिल सकता था। मैं फारसी भाषा जानता था इसलिए फारसी में बात करने में मुझे कठिनाई नहीं थी मैंने उससे फारसी में ही बात की। उसने रूखेपन से संक्षिप्त उत्तर दिया और पहाडि़यों की तरफ उंगली इंगित कर दी। किसी तरह हमने रात गहरी संकरी घाटी में बिताई और सुबह जल्दी ही गोरेगांव के लिए यात्रा पर दोबारा निकल पड़े। अंत में, अगले दिन मध्याह्न उपरान्त हम थककर निढ़ाल तथा लगभग अधमरे होकर गोरेगांव पहुंचे।
तीसरी घटना जब मैं बड़ौदा रियासत में सेवारत था से संबंधित है। बड़ौदा रियासत से छात्रवृति प्राप्त कर मैं विदेश शिक्षा पाने गया था। इंगलैंड से वापस लौटकर अनुबंध की शर्तों के अंतर्गत मैं बड़ौदा दरबार में सेवारत हुआ। मुझे बड़ौदा में रहने को घर नहीं मिला। पूरे बड़ौदा शहर में न कोई हिन्दू, न मुसलमान मेरे को घर देने को राजी हुआ किसी भी मोहल्ले में जगह न पाने से हताश होकर मैंने पारसी धर्मशाला में आवास पाने का निर्णय लिया। अमेरिका और इंगलैंड में रहकर मेरा रंग साफ व गोरा हो गया था और व्यक्तित्व भव्य। मैंने अपना फर्जी नाम ‘अदलजी सोराबजी’ रखा और पारसी बन एक पारसी धर्मशाला में रहने लगा। पारसी मैनेजर ने मुझे आवास 2/- प्रतिदिन की दर से दिया। परन्तु जल्दी ही लोगों को इस तथ्य की भनक लग गई कि बड़ौदा के महाराज गायकवाड़ ने एक महार लड़के को अपने दरबार में एक