28. 17.5.1936 तुम्हारी मुक्ति व उन्नति के लिए धर्म परिवर्तन आवश्यक। - Page 126

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अधिकारी नियुक्त किया है। जल्दी ही मेरे फर्जी नाम से पारसी धर्मशाला में रहने को लेकर मैं संदेह के दायरे में आ गया और मेरा भेद खुल गया।

मेरे वहां रहने के दूसरे ही दिन जब मैं सुबह का जलपान कर कार्यालय के लिए निकलने को था कि कोई पंद्रह से बीस पारसी लठैतों की भीड़ ने मुझे टोका और जान से मारने की धमकी देते हुए मुझसे पूछा कि मैं कौन था, मैंने कहा, ‘‘मैं एक हिन्दू हूँ’’। परन्तु उन्हें इस उत्तर से संतुष्ट नहीं होना था। क्रोध में उन्होंने मेरे पर गालियों की बौछार कर दी और मुझे तुरन्त कमरा खाली करने को कहा। समय पर काम आई मेरी बुद्धि और मेरे ज्ञान से मुझे संबल मिला। नम्रता से मैंने 8 घंटे और ठहरने की स्वीकृति मांगी। दिन भर मैंने आवास पाने के प्रयास किए परन्तु मैं कहीं भी सिर छुपाने के लिए जगह पाने में बुरी तरह विफल रहा। मैंने अपने कई मित्रों से सहायता मांगी परन्तु हर एक ने कोई न कोई बहाना बनाकर मेरी प्रार्थना ठुकरा दी और मुझे ठहराने में असमर्थता जता दी। मैं पूरी तरह से निराश तथा निढ़ाल हो गया। आगे क्या करता? निर्णय मैं नही ले पाया। निराश और पराजित मैं चुपचाप एक स्थान पर बैठ गया और मेरी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। घर मिलने की कोई आशा न होने पर और नौकरी छोड़ना ही दूसरा विकल्प लगने की स्थिति में, मैंने त्याग पत्र दे दिया और रात की गाड़ी से बम्बई के लिए रवाना हो गया।

जीवन में भयभीत करने वाली ऐसी घटनायें आपके जीवन में भी अवश्य घटित हुई हांगी। मैं आप लोगों से पूछना चाहूंगा ऐसे समाज के भीतर जीने की क्या तुक है जिसमें मानवता है ही नहीं, जिसमें आपके प्रति आदर नहीं, जो आपकी रक्षा नहीं करता और जो आपको मानव ही नहीं मानता? इसके विपरीत यह समाज आपका अपमान करता है, नीचा दिखाता है तथा तुम्हें आहत करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देता। कोई भी मनुष्य जिसमें रत्तीभर भी आत्मसम्मान है और शिष्टाचार है इस निर्दयी धर्म से जुड़कर रहना पसन्द नहीं करेगा, केवल वे जो गुलामी पंसद करते हैं वे ही इस धर्म में रह सकते हैं।

मेरे पिता तथा पूर्वज बड़े श्रद्धालु हिन्दू थे परन्तु हिन्दू धर्म द्वारा लगाई पाबन्दियों के चलते वे शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाए। धर्म ने उन्हें शस्त्र धारण करने की स्वीकृति नहीं दी। हिन्दुत्व के अन्दर उनको धन अर्जित करना भी वर्जित था। इस धर्म का एक अनुचर होते हुए मेरे पिता ये तीनों वस्तुएं नहीं पा सके।

मैं संस्कृत पढ़ना चाहता था परन्तु हिन्दू धर्म द्वारा लगाई गई रोकों के चलते मेरे लिए संस्कृत सीख पाना संभव नहीं हुआ। अब मेरे लिए, शिक्षा, धन पाना और शस्त्र धारण करना संभव हो गया है।