106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस तथ्य के आधार पर कि हिन्दू धर्म ने तुम्हारे पूर्वजों को अपमानजनक जीवन जीने को मजबूर किया और उन्हें हर प्रकार से नीचा दिखाया उनको गरीब तथा अज्ञानी बनाए रखा। ऐसे अत्यन्त दुष्टतापूर्ण धर्म की परत में तुम क्यों लिपटे रहना चाहते हो? अगर तुम अपने पूर्वजों की तरह अपमानजनक जीवन जीने, नीचे स्तर पर बने रहने और अपमान सहने को स्वीकार करते रहोगे तो तुम घृणास्पद ही बने रहोगे न ही कोई तुम्हें आदर करेगा, न ही कोई तुम्हारी सहायता को आएगा।
इन कारणों से धर्म परिवर्तन का प्रश्न हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। अगर तुम हिन्दू धर्म की परत में ही बने रहते हो तो तुम्हारा स्तर एक दास के स्तर से ज्यादा नहीं हो सकेगा। व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए कोई प्रतिबन्ध नहीं है। अगर मैं एक अछूत बना रहूंगा तो भी मैं किसी सवर्ण हिन्दू के बराबर का स्तर प्राप्त कर सकता हूं। इस प्रकार मैं हिन्दू बना रहूं या नहीं, इससे मेरे स्वास्थ्य पर इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। मैं एक उच्च न्यायालय का न्यायमूर्ति या विधायिका या विधान परिषद का सदस्य या एक मंत्री बन सकता हूं। परन्तु आपकी मुक्ति और प्रगति के लिए धर्म परिवर्तन मुझे अति आवश्यक लगता है।
प्रतिष्ठा से गिराए हुए तथा निर्लज्ज जीवन को बदलकर स्वर्णिम जीवन और भविष्य बनाने के लिए धर्म परिवर्तन नितांत आवश्यक है। मुझे आशा है कि आपकी दशा सुधारने हेतु आपके मित्र व शुभचिंतक अवश्य आपकी सहायता के लिए सहयोग देंगे। आपका भाग्य सुधारने के लिए मुझे धर्म परिवर्तन प्रक्रिया आरम्भ करनी होगी। मैं अपनी प्रगति के प्रश्न के बारे में कतई िंचंतित नहीं हूं। जो कुछ भी मैं आज के दिन कर रहा हूं उसमें आप सबका हित व प्रयोजन निहित है।
आप मुझे ईश्वर की तरह सम्मान देते हो परन्तु मैं आप सबकी तरह एक मानव हूं और मैं देवमूर्ति नहीं हूं। आप मुझसे जो भी सहायता चाहते हैं मैं करने को तैयार हूं। मैंने आपको इस निराश व अपमानजनक अवस्था से छुटकारा दिलाने का निर्णय किया है। मैं कुछ भी निजी लाभ के लिए नहीं कर रहा हूं। आपके उत्थान और आपके जीवन को उपयोगी तथा उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए मैं संघर्षरत रहूंगा। आपको अपना उत्तरादायित्व समझना अति आवश्यक है और मेरे दर्शाये मार्ग पर चलें। अगर आप गंभीरता से अनुपालन करेंगे तो लक्ष्य प्राप्त करना कतई कठिन नहीं होगा। ’’ ख्1,
1 जनता : 23 मई 1936 मराठी में प्रकाशित (अनुवादित)