108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मानवता की पहचान को जो अधर्म कहे वह धर्म नहीं-एक रोग है। एक धर्म जो अपवित्र जानवर को छूने की आज्ञा देता हो, परन्तु मानव को
छूने की मनाही करे, वह धर्म नहीं एक मूर्खता है।
एक धर्म जो योजनाबद्ध षड़यंत्र से, एक वर्ण को शिक्षा से वंचित रखे, धन
संचय तथा शस्त्र धारण करने को मना करे, यह धर्म नहीं है, बलिक मानव
जीवन का उपहास है।
एक धर्म जो निरक्षर को निरक्षर बने रहने तथा गरीब को गरीब बने रहने
के लिए बाधित करता है, धर्म नहीं एक दण्ड है।
वे जो दावा करते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं लेकिन इन्सान से, जानवरों से
भी खराब व्यवहार करते हैं, वे पाखण्डी हैं। ऐसे लोगों की संगति से दूर
रहो।
वे जो चीटियों को चीनी खिलाते हैं लेकिन आदमियों को पानी पीने को
मनाही कर मारते हैं वे पाखण्डी हैं। इनकी संगति से बचो।
एक यूरोपियन मिशनरी मि. स्टैनी जोन्स तथा श्री बी.जे. जाधव वहाँ विशेषतौर पर आमन्त्रित थे। वहां पर बहुत से सिक्ख, मुस्लिम नेता तथा पुरोहित भी थे जो धर्म परिवर्तन के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष संकेतों को समझने के उत्सुक थे। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य 13 अक्तूबर 1935 को येवला में की गई घोषणा को कार्यान्वित करने के तरीके व नीति ढूंढना था। श्री डी. डोलास ने प्रतिनिधियों का स्वागत किया जबकि श्री वी.एस. वेंकेटराव हैदराबाद से आए दलित वर्ग के नेता, इस सभा के अध्यक्ष रहे। ख्1, इस बारे में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने 31 मई 1936 को मराठी में विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उन्होंने तब पहले से तैयार भाषण का वाचन किया। - संपादक
उन्होंने कहा-
देवियो और सज्जनो,
अब तक आप जान गए होंगे कि यह सभा मेरे द्वारा हाल ही में धर्म परिवर्तन घोषणा पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने के उद्देश्य से बुलाई गई है। धर्म परिर्वतन का विषय मेरा बहुत प्रिय विषय है। केवल यही नहीं, मेरे विचार से आपका पूरा भविष्य इस विषय पर आधारित है। मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि आपको इस समस्या की गम्भीरता अच्छे से समझ आ गई है। अगर ऐसा नहीं होता तो आप इतनी विशाल संख्या़ में एकत्रित न हुए होते। मुझे इस भारी संख्या़ को देखकर बहुत खुशी है।
1 जनता, 20 जून, 1936