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134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किए और जितने कष्ट झेले, वैसा किसी और ने नहीं झेला। परन्तु मैं अनुभव करता हूं कि केवल राजनैतिक अधिकारों का मोहताज हो जाना उचित नहीं हैं। ये राजनैतिक संरक्षण जन्म जन्मातर के लिए नहीं दिए गए। यह कभी तो समाप्त होगें ही। अंग्रेज सरकार ने इस संरक्षण की सीमा 20 साल निर्धारित की थी। यद्यपि पूना सन्धि में ऐसी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है फिर भी यह हमेशा-हमेशा के लिए रहने वाला नहीं। जो इन राजनैतिक संरक्षणों पर आश्रित रहना चाहते हैं, उनको यह अवश्य विचार करना चाहिए कि जब यह संरक्षण ले लिए जाएंगे तब क्या होगा। उस दिन हमारे राजनैतिक अधिकार समाप्त हो जाएंगे और हमें अपनी सामाजिक शक्ति का आश्रय लेना होगा। मैंने आपसे पहले ही कहा है कि सामाजिक शक्ति की हमारे अन्दर कमी है। इसलिए, मैंने आपको शुरू में ही सिद्ध कर दिया है कि यह शक्ति धर्म परिवर्तन के बिना प्राप्त नहीं की जा सकती। हमें केवल वर्तमान की चिन्ता नहीं होनी चाहिए। और अस्थायी लाभों के प्रलोभन से हमारे कष्ट बढ़ना निश्चित है। इन परिस्थितियों में, हमें स्थायी लाभों के बारे में सोचना आवश्यक है। मेरे विचार से धर्म परिवर्तन ही अनादि और अनन्त सुख का मार्ग है। इस प्रयोजन के लिए यदि हमें राजनैतिक अधिकारों की बलि चढ़ानी पड़े है तो हमें संकोच नहीं करना चाहिए। राजनैतिक संरक्षणों को धर्म परिवर्तन से कोई हानि नहीं होती। यह मेरी समझ से परे है कि राजनैतिक संरक्षण धर्म परिवर्तन से खटाई में क्यों पड़ेंगे। आप जहां भी जाएंगे आपके राजनैतिक अधिकार और संरक्षण आपके साथ रहेंगे। इस बारे में मुझे कोई संदेह नहीं है। अगर आप मुस्लिम बनते है तो आपको मुसलमानों के राजनैतिक अधिकार मिलेंगे, यदि आप ईसाई बनते है तो आपको ईसाईयों के राजनैतिक अधिकार मिलेंगे, यदि आप सिक्ख बनते हैं तो आपको सिक्खों के राजनैतिक अधिकार मिलेंगे। राजनैतिक अधिकार जनसंख्या पर आधारित है। किसी भी समाज के राजनैतिक संरक्षण उनकी जनसंख्या बढ़ने से और बढ़ जाएंगे। किसी को यह गलत धारणा न रहे कि यदि हम हिन्दू समाज को छोड़ते है तो निर्धारित की गई 15 सीटें हिन्दुओं को वापस चले जाएंगी। यदि हम मुस्लिम बनते हैं तो हमारी 15 सीटें मुसलमानों के आरक्षित स्थानों के साथ जुड़ जाएगी। इसी प्रकार, यदि हम ईसाई बनते हैं तो हमारी सीटें ईसाईयों के आरक्षित स्थानों में जुड़ जाएंगी। संक्षेप में, हमारे राजनैतिक अधिकार हमारे साथ ही रहेंगे। अतः ये डर किसी के मन में न रहे। बल्कि आप यह ध्यानपूर्वक सोंचे की अगर हम हिन्दू रहते हैं और धर्म परिवर्तन नहीं करते, तो क्या हमारे अधिकार सुरक्षित रहेंगे? कल्पना करें कि अगर हिन्दू एक अधिनियम पास कर कानून बनवाए कि अस्पृश्यता पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाए। छुआछूत का पालन करने वाले को दण्डित किया जायेगा। तब वे आपसे पूछ सकते हैं कि विधि द्वारा अस्पृश्यता हटा दी गई है और अब आप अछूत नहीं है। आप केवल गरीब और पिछड़े