39. 1.1.1938 ईसाई राजनीतिक रूप से पीछे। - Page 178

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ईसाई राजनीतिक रूप से पीछे छूट गए हैं

‘‘डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने शोलापुर में 1 जनवरी, 1938 को ओजस्वी भाषण दिया। स्थानीय लोग ईसाई धर्म पर उनके विचारों को सुनने के लिए उत्सुक थे। इसलिए उन्होंने पूज्य गंगाधर जाधव की अध्यक्षता में ईसाइयों की सभा को संबोधित किया।’’

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने कहा कि जबसे उन्होंने हिंदू धर्म को कसौटी पर कसने के अपने संकल्प की घोषणा की है, उस दिन से वे एक सौदे की वस्तु अथवा हास्य का स्रोत बन चुके हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के सुविख्यात नाटककार आचार्य पी. के. अत्रे द्वारा लिखी गई वंदे मातरम के हास्य रूपांतरण का संदर्भ लिया जिन्होंने कि अपने नाटक में धर्मांतरण के विचार का मजाक उड़ाया था। फिर भी उन्होंने कहा कि वे अपने संकल्प के प्रति दृढ़ हैं। तुलनात्मक धर्म के अपने अध्ययन के आधार पर उन्होंने कहा कि केवल दो व्यक्तित्व ही उनको प्रभावित कर सके, वे थे बुद्ध और ईसा मसीह। उन्होंने आगे कहा कि वे एक ऐसा धर्म चाहते हैं जो लोगों को इस संबंध में निर्देशित करे कि उन्हें एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए साथ ही जो समानता, भ्रातृत्व ओैर स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से दूसरों तथा भगवान के प्रति व्यक्ति के कर्त्तव्यों का निर्धारण करे।

उन्होंने ईसाइयों को बताया कि दक्षिण भारत में उनके सहधर्मी गिरिजाघरों में जाति व्यवस्था को अभी भी मान रहे हैं। इसके अतिरिक्त, वे राजनीतिक रूप से पीछे रह गए हैं। यदि महार बच्चे ईसाई बन जाते हैं तो वे अपनी छात्रवृत्ति खो बैठते हैं। इस प्रकार उनके ईसाई बनने में कोई आर्थिक लाभ नहीं है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कहा कि एक समुदाय के रूप में भारतीय ईसाइयों ने कभी भी सामाजिक अन्याय को दूर करने के लिए लड़ाई नहीं लड़ी है। ख्1,

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1 कीर, पृष्ठ 299-300