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लोकतंत्र में ऐसे सभी लोगों को सम्मान के साथ सुना जाना

चाहिए जो सुनने लायक हैं

पंढरपुर से डॉ. बी. आर. अम्बेडकर मातंग सम्मेलन को संबोधित करने के लिए शोलापुर गए। उनके वहां पहुंचने पर भगवत चित्रा मंदिर में 4 जनवरी, 1938 ख्’, को प्रातःकाल शोलापुर नगरपालिका द्वारा उनका नागरिक अभिनंदन किया गया। नागरिक अभिनंदन राव बहादुर डॉ. वी. वी. मुले द्वारा पढ़ा और प्रस्तुत किया गया जिन्होंने नगरपालिका के अध्यक्ष के रूप में शोलापुर में अछूतों के हितों के संबंध में सहायता की थी। जवाब में डॉ. अम्बेडकर ने एक बहुत महत्वपूर्ण भाषण दिया जिसमें उन्होंने संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर अपने विचार व्यक्त किए।

उन्होंने कहा। :-

‘‘इस देश में जो राजनीतिक स्थिति बनी है उसके चलते व्यक्तियों में केवल एक राजनीतिक पार्टी अर्थात कांग्रेस के प्रति श्रृद्धा रखने की आदत विकसित हो गई है।’’

उन्होंने आगे कहा, ‘‘मैं सभी प्रकार की स्थितियों और दावों के संबंध में लोकतंत्र को आदर्श व्यवस्था मानने वालों में नहीं हूं; और भारत की आज की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए लोकतंत्र सरकार चलाने की सबसे अनुपयुक्त प्रणाली है। किसी भी कीमत पर, भले ही कुछ समय के लिए, भारत को किसी बौद्धिक तानाशाह के मजबूत हाथों की आवश्यकता है।’’ ख्1,

उन्होंने कहा, ‘‘इस देश में लोकतंत्र है लेकिन यह एक ऐसा लोकतंत्र है जिसने अपनी बुद्धिमत्ता का उपयोग करना छोड़ दिया है। इसने अपने आपको केवल एक और एकमात्र संगठन से बांध रखा है। यह इस संगठन के कष्त्यों अथवा विचारों का निर्णय करने के लिए तैयार नहीं है। मैं इसे सबसे बड़ी दुर्भावना, एक रोग और एक बीमारी मानता हूं। इसने हमारे लोगों को प्रभावित किया है। वे नशे की हालत में हैं।’’ उन्होंने आगे कहा ‘‘दुर्भाग्य से भारतीय व्यक्ति ऐसे पारंपरिक व्यक्ति हैं जिनमें विश्वास अधिक है और बुद्धि कम। कोई भी व्यक्ति जो सामान्य से हटकर कुछ अलग करता है, कुछ ऐसा जो अन्य देशों में विचित्र और उसे करने वाले को पागल कहा जाता हो, उसे इस देश में महात्मा या योगी कहते हैं। और लोग उसका अनुसरण