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महान संघर्ष
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‘‘वर्ष 1927 के पहले दिन, यानी 1 जनवरी की शुरुआत दलित वर्गों द्वारा ‘‘कोरेगांव युद्ध स्मारक’’ पर आयोजित एक सभा से हुई। उस वर्ष दलित वर्ग के सभी ख्याति प्राप्त नेताओं ने इस सभा में भाग लिया।
डॉ. भी.रा. अम्बेडकर ने सभा को संबोधित किया और बताया कि उनके समुदाय से सैंकड़ों योद्धाओं ने गोरों (‘ब्रिटिश’) के साथ मिलकर लड़ाई में भाग लिया था और वे जी जान से लड़े थे। परन्तु लड़ाई के तुरन्त बाद उन्हीं गोरों ने उनको ‘‘असैनिक समुदाय की उपाधि देकर बदनाम कर दिया था, क्योंकि सवर्ण हिन्दू उनसे अछूतों जैसा व्यवहार करते हैं, और घोर घृणा करते हैं, के वे स्थाई जीविका के साधन न होने के कारण मजबूरीवश गोरों की सेना में भर्ती हुए। अन्त में उन्होंने (बाबा साहिब) लोगों का आवाहन किया कि वे सरकार की इस नीति का जोरशोर से विरोध करें और उनकी सैनिक सेवा भर्ती पर लगाई रोक को हटाने पर सरकार को मजबूर कर दें’’ ख्1,
कोरेगांव युद्ध स्मारक का महत्वः
तथापि अछूतों की गोरों की सेना {विशेषतया बम्बई सेना} में विगतकाल में हुई भर्ती ने अछूतों को एक सुनहरा मौका प्रदान किया था। जहां वे अपना शौर्य व वीरता देश के भीतर व बाहरी लड़ाई के मैदान में दिखा सके और गोरे साहबों ने उनकी भरपूर प्रशंसा की थी।
‘‘ जनरल मैलकॉम ने बम्बई अधिकारियों व सिपाहियों की कर्त्तव्यनिष्ठा के लिए प्रशंसा की थी। जनरल मैलकॉम ने सन् 1816 में निदेशक मंडल के सचिव को लिखकर इस बात की पुष्टि की थी कि बम्बई सेना में सभी वर्गों और सभी धर्मों जैसे हिन्दू, मुसलमान, यहूदी व इसाई धर्म के लोग थे। महाराष्ट्र के हिन्दुओं में परवरिस (महार) संख्या में राजपूतों व कुछ दूसरी सवर्ण जातियों की संख्या से कहीं अधिक थे। यह परवरिस बम्बई के दक्षिणी समुद्र तट के रहने वाले थे। महार सिपाहियों की प्रशंसा में बहुत कुछ लिखा गया था जैसे कि इन ‘बम्बई सेना’ के
1 कीर, पृष्ठ 69 से उद्धृत