93. 24.9.1944 मैं भारत के देश भक्तों से बहुत आगे था। - Page 331

310 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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मैं भारत के देश भक्तों से बहुत आगे था.........

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24 सितंबर, 1944 (रविवार) को मैमोरियल हाल, पार्क टाउन, मद्रास में, राव बहादुर एन. शिवराज के सभापतित्व में अछूतों की एक सभा आयोजित की गई। उसमें डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का स्वागत जोरदार करतल ध्वनि से किया गया। उस सभा में (1) मद्रास आदिद्रविड़ वर्कर्स एसोसियेशन, (2) साउथ इंडियन बुद्धिस्ट एसोसियेशन, (3) नागरिक और सैनिक स्टेशन बंगलोर के अनुसूचित जातियों के फेडरेशन, (4) मद्रास अनुसूचित जाति छात्र संघ और (5) आंध्र प्रांतीय अनुसूचित जाति कल्याण संध और अन्य संस्थाओं ने डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को अभिनन्दन-पत्र भेंट किए। इस मौके पर एक युवक ने डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को भगवान बुद्ध की एक सुंदर प्रमि भेंट की। वह प्रतिमा उसने स्वयं बनाई थी। ख्1,

डॉ. अम्बेडकर ने भेंट किए गए अभिनन्दन पत्रों के उत्तर में कहा-

‘‘मैं यह कहना चाहता हूं कि इसी मद्रास शहर में, मैंने इस शहर के एक बहुत प्रतिष्ठित नागरिक की दो टिप्पणियां सुनीं जो मेरे लिए बहुत असम्मानजनक थीं अर्थात राइट ऑनरेबल यू.एस. श्री निवास शास्त्री द्वारा हाल में दिए गए एक भाषण के मौके पर, जब श्री शास्त्री का मन पाकिस्तान के इस मुद्दे से व्याकुल नहीं था और जब वह गांधी जी जो अकेले किसी भी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व पूरी तरह कर सकते हैं, को भारत की आत्मा का साक्षात् रूप मानते थे। तब श्री शास्त्री ने कहा था कि चाहे जो भी हो, भारत की जनता को यह ध्यान रखने की बहुत अधिक सावधानी बरतनी चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में मुझे किसी भी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कोई स्थान न मिले। उन वृद्ध पूज्य राजनेता से इस प्रकार की भाषा सुनकर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। मैं यह पता लगाने के लिए अपने दिल को टटोल रहा था कि क्या वास्तव में मेरा अपना संपूर्ण सार्वजनिक जीवन, जो मैं यह मानने को तैयार हूं कि वह इतना विशाल नहीं है, जितना राइट ऑनरेबल शास्त्री का रहा है, क्या इतना शानदार है, जितना उनका क्या अपने सार्वजनिक जीवन के अल्पकाल में मैंने ऐसा कुछ हेय किया है कि भारत मुझे किसी अंतरराष्ट्रीय सभा में आसीन देखकर लज्जित होगा? मैं कोई अपशब्द बोलना नहीं चाहता था, क्योंकि

1 खैरमोड़े (जिल्द) पृष्ठ 356