92. 23.9.1944 एकता का महत्त्व सर्वोपरि है। - Page 330

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दूसरा कारण यह था कि उसके पास बहुत संकीर्ण राजनीतिक कार्यक्रम थे। पार्टी के विपक्षी, पार्टी को नौकरी ढूंढने वालों की पार्टी कहते थे। ‘हिंदू’ में प्रायः इसी शब्द का इस्तेमाल हुआ है। मैं इस आलोचना को अधिक महत्व नहीं देता, क्योंकि यदि हम नौकरी की तलाश में थे तो दूसरे पक्ष के लोग भी हमसे पीछे नहीं थे। गैर-ब्राह्मण पार्टी के राजनीतिक कार्यक्रम में एक दोष यह रहा कि पार्टी ने अपने नौजवानों के लिए कुछ नौकरियां पाने को अपना प्रधान उद्देश्य बना लिया था। वह पूरी तरह विधिसम्मत था। लेकिन क्या गैर-ब्राह्मण युवाओं ने, जिनके लिए पार्टी ने सार्वजनिक सेवाओं में नौकरी पाने के लिए 20 वर्ष तक संघर्ष किया था, नौकरियों में अपना वेतन पाने के बाद पार्टी को याद किया? पार्टी 20 वर्ष तक सत्तारूढ़ रही। वह गांवों में रहने वाले 90 % गैर-ब्राह्मणों को भूल गई, जो गरीबी में जीवनयापन कर रहे थे, और सूदखोरों के जाल में फंसते जा रहे थे।

‘‘मैंने इस कालावधि में बने कानूनों को देखा है और भूमि सुधार विषयक एकमात्र विधान को छोड़कर गैर-ब्राह्मण पार्टी ने किसानों और पट्टेदारों की कभी चिंता नहीं की। हुआ यह कि ‘‘कांग्रेसी लोगों ने इससे चुपचाप अपनी ताकत बढ़ा ली।’’

‘‘मुझे इन घटनाओं से बहुत कष्ट हुआ है। मैं एक बात पर जोर देना चाहता हूं कि पार्टी ही वह चीज है, जो उन्हें बचा पाएगी। पार्टी को अच्छा नेता चाहिए, पार्टी को संगठन चाहिए, पार्टी को राजनीतिक मंच चाहिए।

अब हम नेतओं के बारे में ज्यादा आलोचनात्मक विचार करें। हम कांग्रेस पर दृष्टिपात करें। महात्मा गांधी को नेता के रूप में किसी भी अन्य देश में कौन स्वीकार करता? वह एक ऐसा आदमी है जिसके पास न तो संकल्पना है, न ज्ञान और न निर्णय है वह ऐसा आदमी है जो सार्वजनिक जीवन में जीवन-पर्यन्त विफल रहा। जब गाधी जी कोई अच्छी नीति लाते थे और भारत कामयाब होने के करीब होता था, तो वह कोई महत्वपूर्ण अवसर नहीं होता था। जब श्री जिन्ना ने अपना पाकिस्तान मुद्दा उठाया तो 2-3 वर्ष बाद गांधी जी ने इसे पाप बताया और उसे अनसुना कर दिया। अंततोगत्वा, स्पष्टवादिता सामने आई। गांजी जी भयभीत हो गए। अब वह उलटफेर करने के लिए जूझ रहे थे। फिर भी वह इस देश में नेता बने रहे, क्योंकि कांग्रेस ने अपने नेता को कसौटी पर नहीं कसा।

आइए, श्री जिन्ना के पक्ष पर बात करें। वह एक निरंकुश नेता बने। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, कि लीग ही उनका सर्वस्व तमाशा था। लेकिन मुसलमान, सही रूप में उनमें आस्था रखते थे। कांग्रेस जानती थी कि गांधी जी पर लगाया गया कोई भी आरोप संगठन को बिखेर देगा। इसलिए उसने वह सब काफी झेला, जो लोकतंत्र से असंगत था। इसलिए मैं गैर-ब्राह्मणों से कहूंगा ‘एकता का महत्व सर्वोपरि है। इससे सबक सीखो, कहीं ज्यादा देर न हो जाए’।’’

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