324 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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24 सितंबर, 1944 को डॉ. अम्बेडकर ने शिवराज मैमोरियल हाल, मद्रास ख्1, में अपने भाषण में श्रीनिवास शास्त्री और गांधी जी की कटु आलोचना की।
उन्होंने कहा -
‘‘.....अपने हाल के कुछ भाषणों में राइट ऑनरेबल वी.एस. श्रीनिवासन शास्त्री ने कहा है कि वह गांधी जी को भारत की आत्मा का साकार रूप मानते हैं और यह कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व गांधी जी को करना चाहिए तथा बड़ी सावधानी से यह ध्यान रखा जाए कि किसी भी परिस्थिति में उसके (डॉ. अम्बेडकर) जैसे व्यक्तियों को किसी भी भावी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कोई जगह न मिले।
‘‘.....मैं यह पता लगाने के लिए अपना दिल टटोल रहा था कि क्या वास्तव में मैंने अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में, जो मैं मानता हूं इतना विशाल नहीं है जितना माननीय श्रीनिवास शास्त्री का है और न ही इतना शानदार है जितना उनका है, अपने जनसेवा के अल्पकाल में कुछ इतना घटिया काम कर दिया है कि भारत मुझे अंतरराष्ट्रीय सभा में आसीन देखकर लज्जित हो जाएगा। मैं गाली गलौज की भाषा बोलना नहीं चाहता, क्योंकि मैं आसानी से कह सकता था कि राइट ऑनरेबल शास्त्री ब्रिटिश सरकार का ‘पालतू कुत्ता’ है। इस पूरे समय वह ब्रिटिश शासन की गोद में बैठे रहे, और यदि उन्होंने भारत में या भारत के बाहर कोई कुख्याति और महानता हासिल की है, तो वह मुख्यतः इस कारण कि ब्रिटिश सरकार ने प्रसन्न होकर उन्हें ‘जमूरा’ बनाकर रखा है। मैं यह नहीं कहना चाहता कि जो कुछ श्री शास्त्री ने कहा है, वह वास्तव में जर्जरित टहनी वाले पेड़ पर बैठे बूढ़े कौए की कांव-कांव है ... ‘‘....श्री श्रीनिवासन शास्त्री ने जो कुछ कहा वह संभवतः उसी का प्रतीक है, जो ज्यादातर कांग्रेसी कह रहे थे और वह यह था कि जब तक अनुसूचित जातियां उनके नेतृत्व में हैं तब तक वे देश के व्यापक हित के प्रतिकूल रहेंगी। ज्यादातर लोग नहीं जानते कि गांधी जी ने गोलमेज सम्मेलन में क्या किया था। वे सब सोचते हैं कि उनकी भूमिका शानदार रही। महात्मा गांधी स्वाधीनता मांगने का प्रस्ताव लेकर सम्मेलन में गए थे। वह एक ऐसी चीज थी जो भारत में बहुत से गंभीर राजनेताओं की मांग के परे थी। लेकिन गांधी जी ने क्या किया? इस मध्ययुगीन वृद्ध सज्जन ने, जो स्वाधीनता से कम किसी बात पर राजी न होने का प्रस्ताव लेकर सम्मेलन में गए थे, सर सेमुअल होर से कहा था कि वह प्रांतीय स्वायत्तता स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार हैं। (शर्म-शर्म के नारे)’’।
1 खैरमोड़े खंड 9, पृष्ठ 384 2 द मेल, मद्रास, 26 सितंबर, 1944