94. 24.9.1944 भारत का इतिहास बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म के संघर्ष के अलावा अन्य कुछ नहीं है। - Page 344

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वेदों के कुछ पहलुओं का विवेचन करते हुए और कुछ दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि उनमें कुछ अंश जालसाजी के हैं और उनका समावेश बाद के काल में किया गया है। उन्होंने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि वे अपनी विचारधारा के लिए एक प्रकार की धार्मिक स्वीकृति चाहते थे। उनके विचार में यह एक कारण था कि ब्राह्मणों ने सामाजिक सिद्धांतों के प्रति इतनी अयथार्थवादी दृष्टि अपनाने का आग्रह किया था। बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म के बीच का संघर्ष सर्वोच्चता के लिए था। जब बौद्ध धर्म लुप्त हुआ तो वह विस्मयकारी ढंग से लुप्त हो गया। विश्व के इतिहास में, बुद्ध स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का संदेश देने वाले प्रथम व्यक्ति थे। वे लोग इसलिए अदृश्य हो गए, क्योंकि प्रति-क्रांति ने उस क्रांति को पराभूत कर दिया। वे तार्किकता की भावना भी खो चुके थे, और यही कारण था कि संपूर्ण हिंदू समाज नितांत अंधविश्वास, मूर्ति पूजा और सभी प्रकार के कदाचारों से ग्रस्त हो गया था। उनका पालन धर्म के नाम पर किया जाता था। बुद्ध की सत्य के प्रति तार्किक विचारधारा विलुप्त हो गई। आज वे प्रति-क्रांतिकारियों के चंगुल में हैं। प्रति-कांतिकारियों के धर्मग्रंथ भगवद् गीता और मनुस्मृति हैं।

आज की त्रासदी यह है कि राजनीति में अतार्किक विचारधारा प्रवेश कर गई है। राजनेता हर देश में कसौटी पर हैं। लेकिन भारत में इसका समाधान क्या है? श्री गांधी कभी कसौटी पर नहीं रहे। क्या वह वास्तव में कसौटी पर खरे हैं? नहीं। यदि वह कोई बात कहते हैं, तो हर कोई उसे इस प्रकार स्वीकार करता है मानों वह बात वेदों में से हो। यदि वह विरोध में कुछ कहें तो भी हमें वह बात माननी होगी। दो वर्ष पहले, श्री गांधी ने कहा था पाकिस्तान का विचार नापाक है क्योंकि कांग्रेसियों ने कहा, वह नापाक है। मैंने भी पाकिस्तान पर एक किताब लिखी है। मुझे कहा गया था कि मेरी बुद्धि मुस्लिम लीग के पास बंधक रखी है और वह नापाक काम कर रही है आदि आदि। हाज श्री गांधी कहते हैं पाकिस्तान नापाक नहीं है। अतार्किकता का यह एक उदाहरण मात्र है, जो हमारे सामाजिक और बौद्धिक चिंतन में ही नहीं, राजनीतिक चिंतन में भी घर कर गया है।

मुझे विश्वास है कि यदि हमने अतिशीघ्र कुछ नहीं किया तो हम इस देश के लिए एक बड़ी आफत खड़ कर देंगे......।’’ ख्1,

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1 द लिबरेटर मद्रास, 25.9.1944