96. 28.9.1944 हम इस देश के भाग्य-विधाता हैं। - Page 347

326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ने जा रवैया अपनाया था, वही बहुत कुछ, भारत में, अल्पसंख्यकों की समस्या के बारे में गांधी जी द्वारा अपनाया गया था। अब्राहम लिंकन पूरी भावना के साथ यूनियन के पक्ष में थे। वह दास प्रथा के रक्षा थे, फिर भी दासता से मुक्ति की घोषणा अब्राहम लिंकन द्वारा सन् 1863 में की गई। वह ऐसा करने के लिए आजाद थे ताकि वह उत्तरी सेनाओं के लिए नीग्रों की मदद प्राप्त कर सकें। श्री गांधी का रवैया भी बिल्कुल वैसा ही प्रतीत होता है। वह हमेशा कहते हैं - ‘मैं स्वतंत्रता चाहता हूँ लेकिन मैं चतुर्वर्णाश्रम धर्म चाहता हूं।’ श्री गांधी के नाकामयाब होने का एक कारण उनका यही रवैया है। मुझे आशा और विश्वास है कि श्री गांधी इस भूल को समझने में समर्थ होंगे।

‘‘देश के लिए स्वाधीनता हर कोई चाहता है। लेकिन वे यह नहीं समझ पाए कि राजनीति में समता की श्रेणीबद्ध व्यवस्था है। वे अल्पसंख्यकों के लिए समता और स्वतंत्रता तथा आजादी चाहते हैं। जो भारतीय अल्पसंख्यकों के रक्षोपायों की व्यवस्था पर आपत्ति करता है, वह देश का मित्र नहीं है और वह लोकतांत्रिक नहीं है। वह देश का शत्रु है। क्या मैं पुनः यह कह सकता ह।ू कि इस देश के सामने यह संभवतः एक सुनहरा मौका है। अनेक मित्र हैं, जो यह मानते हैं कि चूंकि ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के बाद भारत की स्थिति की कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की है इसलिए उन्हें भावी घटनाक्रम के बारे में आशंका है। वे युद्ध के बाद भारत के भविष्य के बारे में कोई चिंता महसूस नहीं करते। वे यह नहीं मानते कि इस देश की नियति, ब्रिटिश साम्राज्य में एक आदमी पर, चाहे वह कितना ही महान हो, निर्भर करेगी। हम इस देश के भाग्य विधाता हैं। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि हम अपने में कितनी एकता ला सकते हैं। यदि हम अपने आंतरिक मामलों को व्यवस्थित कर सकते हैं, अपने झगड़ों को इस प्रकार निपटा सकते हैं कि हम एक ऐसा संविधान बनाएं, जिस पर उन सबके हस्ताक्षर हों, जो देश में विभिन्न वर्गों और समुदायों के प्रतिनिधि हैं। हम लोगों के एक और एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में श्री गांधी को प्रधानमंत्री अथवा किसी भी व्यक्ति के पास भेज सकते हैं। यह इस पर निर्भर करता है कि श्री गांधी के विचार क्या होंगे.....।’’ ख्1,

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1 द हिंदू, 2 अक्तूबर, 1944