358 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से तरीके अपनाने चाहिए। मेरे विचार में शैक्षणिक जीवन, व्यावहारिक जीवन और राजनीति की समस्याओं से बिल्कुल भिन्न है। आपको दो बाते करनी होंगी :-
( i ) अपनी बुद्धि, अपनी दृष्टि, सोच की अपनी सामर्थ्य, समस्याओं का समाधान करने की अपनी योग्यता को बढ़ाना ; और
( ii ) उस सामर्थ्य, उस दृष्टि, वास्तविक समस्याओं के बारे में निर्णय लेने की योग्यता पैदा करना जिनका इस देश के लोग आज सामना कर रहे हैं।
‘‘यह कोई एकांत कमरे में रसायन या भौतिकी प्रयोगशाला में मात्र अंडे सेने का काम नहीं है, यह इससे बहुत बड़ी चीज है। आप राजनीतिक अर्थव्यवस्था, राजनीति विज्ञान, इतिहास, वाणिज्य, व्यापार मुद्रा ये सब विषय ही नहीं सीखेंगे जो लोगों के व्यावहारिक जीवन से संबंध रखते हैं। आप उस शिक्षण, उस ज्ञान का उपयोग स्वयं अपने लिए नहीं, बल्कि इस देश के मामलों के प्रभारी राजनेताओं को भी बताएंगे कि उनके सामने समस्याओं के सही समाधान क्या हैं और वे कहाँ गलती कर रहे हैं।
‘‘एक और चीज आपको ध्यान रखनी होगी और वह यह है कि निरंकुश शासन में जहाँ कानून डिक्टेटर की इच्छा से या संपूर्ण प्रभुत्त्व संपन्न शासक द्वारा बनाए जाते हैं, वहां बोलने की कला अनावश्यक है। कोई भी निरंकुश शासक, कोई भी पूर्ण राजा वाक्पटुता पर ध्यान नहीं देगा, क्योंकि उसकी इच्छा ही कानून है। लेकिन संसद में जहाँ कानून बनाए जाते हैं, निःसंदेह लोगों की इच्छा से बनाए जाते हैं वहाँ जो आदमी विपक्षी को जीतकर कामयाब होता है वही वह आदमी है जिसमें अपने विपक्षी को मनाने की कला है। आप अपने विपक्ष को आँखे दिखाकर सदन में बहुमत प्राप्त नहीं कर सकते। अल्पसंख्यक गुंडे लोगों को लाकर बहुसंख्यक को नहीं दबा सकते और न ही बहुसंख्यक अल्पसंख्यक के सदस्यों को आँखे दिखाकर विजय हासिल कर सकते हैं। आपको केवल बोलने की कला से अपने विपक्षी को मनाकर तर्क से उसे अपनी तरफ खींच कर, चाहे सज्जनता से या कठोरता से, लेकिन हमेशा तार्किक ढंग से और शिक्षाप्रद रुप में, मनाकर किसी प्रस्ताव को पारित कराना होगा। अतः संसदीय प्रणाली में सफलता की सबसे बड़ी योग्यता सदन को अपने पक्ष में रखने की सामर्थ्य है। अतः आपको एक गंभीर विषय में भारी योगदान देने के लिए पूरी तरह तैयार हो कर संसद में जाना चाहिए और मैं यह भी कहना चाहूंगा कि आपको सार्वजनिक रूप से बोलने की कला भी गंभीरता से सीखनी चाहिए। यह बहुत कठिन नहीं है, जैसा कि मैं आपको अपने निजी अनुभव से बता सकता हूँ। मैं कोई बड़ा वक्ता नहीं हूँ और मुझे नहीं मालूम कि कोई व्यक्ति जो भारत में उन लोगों का इतिहास लिखना चाहेगा, जिन्होंने भारतीय राजनीति में अपनी