360 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को बोलने के लिए आमंत्रित करने का कोई कर्तव्य या बाध्यता नहीं है। एक उक्ति है ‘स्पीकर ऐसे लोगों को बुलाता है जो उसकी दृष्टि में आने के योग्य हों’ यह एक बड़ा भ्रामक वाक्यांश है- स्पीकर कोई दृष्टि अपना सकता है या जानबूझकर उसे अनदेखा कर सकता है। इसका कारण स्पष्ट है। अनेक वर्षों तक पीठासीन होने के कारण स्पीकर प्रत्येक व्यक्ति को जानता है, उसकी अच्छी बातें जानता है, उसकी बुरी बातें जानता है। जो कुछ वह करता है उसे अब उसके पारिवारिक के रुप में जाना जाता है। जो व्यक्ति टेढ़ा है और बोलता तो है लेकिन कहना कुछ नहीं, उसे वह बिरले ही बोलने की अनुमति देता है।
‘‘आज हमारे यहाँ तथाकथित संसदीय लोकतंत्र है। आइये, इस शब्द को जानें। यह बहुत ही अकेली संस्था है। यह निरंकुश शासन या असीम शासन से भिन्न है, क्योंकि निरंकुश या असीम शासन में संसद जैसी कोई चीज नहीं होती। लोगों की इच्छाओं का कोई मूल्य नहीं होता। राजा या तानाशाह हालात का एक मात्र स्वामी होता है। वह लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है और वह अपनी स्वयं की इच्छा के अनुसार लोगों पर शासन करता है।
‘‘एक और व्यवस्था प्रचलन में है जिसे आज सर्वहारा वर्ग का तानाशाही शासन कहा जाता है। इमारे दृष्टिकोण से दोनों में अंतर, बहुत मामूली है। निरंकुश शासन में जनसाधारण की सेवा करने की बाध्यता होती है। लेकिन मूलभूत रूप से इस प्रकार का तानाशाही शासन तात्विक रुप से पूर्ण राजतंत्र से भिन्न नहीं होता, क्योंकि इनमें से किसी में भी लोगांं की कोई भूमिका नहीं होती। संसदीय लोकतंत्र इन दोनों के बीच का रास्ता है यह अत्यंत नाजुक संस्था है। इसकी विशेषताओं को बहुत ध्यानपूर्वक नोट करना चाहिए, क्योंकि विभिन्न राजनीतिक दार्शनिकों ने भिन्न-भिन्न तरीकों से इसमें किसी हिंसा का वर्णन नहीं किया है। संसदीय लोकतंत्र को विधिसम्मत शासन बताया गया है। एक समय संसदीय लोकतंत्र की यह विशेषता कि यह विधि सम्मत शासन है, निःसंदेह बहुत महत्वपूर्ण, बहुत वास्तविक थी। जब यूरोप में निरंकुश शासन समाप्त हुआ और संसदीय लोकतंत्र अस्तित्व में आया और चलने लगा तो वह पीढ़ी जिसने पूर्ण राजतंत्र से संसदीय लोकतंत्र में होने वाला यह परिवर्तन देखा था, भलीभाँति समझ सकती थी कि विधिसम्मत शासन के रुप में संसदीय लोकतंत्र का वर्णन वास्तव में बहुत यथार्थ और बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पहले का शासन, निजी शासन था। शासक प्रथमतः अपनी इच्छाओं पर निर्भर होता था। दूसरे वह हमेशा अपने आपको कानून से ऊपर रखता था। कानून लोगां के लिए था स्वयं उसके लिए नहीं। विधिसम्मत शासन जो अब हमारे यहाँ है एक सुस्थापित सिद्धांत है। हम अब इसके इतने आदी हो गए हैं कि हम इसे कोई बहुत