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बड़ी बात नहीं मानते लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य अब भी यही है कि जब हम कोई विधि बनाते हैं तो विधि निर्माताओं को भी उस विधि के अधीन रखते हैं।
‘‘किसी ने कहा भी है कि संसदीय लोकतंत्र बहुसंख्यक द्वारा लोकतंत्र है। यह सच है कि हमारे विधान में एक नियम है कि सभी परिस्थितियों का फैसला बहुमत से होगा लेकिन मैं यह कह सकता हूँ कि हम सिद्धांत के बारे में बहुत सावधान रहना होगा। यह सिद्धांत अत्यंत खतरनाक सिद्धांत है। बहुमत का नियम केवल सुविधा के कारण अपनाया गया है लेकिन ईश्वर की खातिर उस सिद्धांत को अत्यधिक भाव न दें, इससे आपको बहुत कठिनाइयाँ हो जायेंगी। एक तरह से बहुमत का नियम गलत नियम है। मैं इस पर बहस करने के लिए तैयार हूँ। आइये उदाहरण देखें। हम संविधान रचना के काम में लगे हुए हैं। मुझे सभापति के रूप में समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। हमें अल्पसंख्यकों के मूल अधिकार की रक्षा करनी होगी। मत भूलिये कि मूल अधिकार का अर्थ है कि बहुसंख्यक को कुछ चीजें करने का अधिकार नहीं है। मूल अधिकार का यही अर्थ है। संविधान में मूल अधिकार बहुसंख्यक की कुछ करने की शक्ति पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है। वस्तुतः बहुमत का नियम आया तो है लेकिन यह मेरे मतानुसार एक धोखे जैसा भी है।
‘‘यदि आप हाऊस ऑफ कामन्स की प्रक्रिया और उसके इतिहास को देखें तो आप पाएंगे कि एक वर्ष में लगभग चौदह-पंद्रह सौ में (हुआ यह था कि) हाऊस ऑफ कामन्स में एक प्रस्ताव लाया गया था :- जो सदस्य पक्ष में थे वे जाकर एक लॉबी में बैठ गए और जो उसके विपक्ष में थे वे दूसरी लॉबी में बैठे। स्पीकर ने क्लर्क से पूछा कि कितने सदस्य आईज़ लॉबी में हैं और कितने नोज़ लॉबी में हैं उन्होंने बताया कि नोज़ लॉबी में 20 हैं और आईज लॉबी में 50। स्पीकर ने उस प्रस्ताव के परिणाम की घोषणा नहीं की। उन्होंने आईज़ लॉबी से कहा कि वे नोज़ लॉबी में चले जाएँ, उन्हें मनाएँ कि वे आकर सदन में बैठे और तभी उन्होंने परिणाम की घोषणा की। इसका क्या अर्थ है, कुछ बहुत महत्वपूर्ण, कि बहुसंख्यक तब तक अपने पक्ष में फैसला नहीं करवा सकते जब तक कि स्पीकर का विश्वास न हो जाए कि यदि सक्रिय रूप से नहीं तो कम से कम असक्रिय तौर पर सही, अल्पसंख्यक सम्मति देने के लिए तैयार हैं। यही मूल प्रक्रिया थी। बाद में किसी कारण यह पद्धति अथवा बहुसंख्यक पर बाहर जाकर विपक्ष को मनाने और वापस आने तथा परिणाम सुनने के लिए मानने की बाध्यता बंद की दी गई। बरहाल, यद्यपि संसदीय लोकतंत्र द्वारा बहुमत का सिद्धांत सप्रयोजन स्वीकार किया गया था, फिर भी यह मत सोचिये कि आप जैसा चाहे अल्पसंख्यक के साथ दुर्व्यवहार कर सकते हैं अथवा उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं। आप इसी सदन में अपने लिए बहुत बड़ी मुश्किल पैदा कर लेंगे। अल्पसंख्यक को हमेशा मनाकर चलना चाहिए, उस पर कभी हुक्म नहीं चलाना चाहिए।