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सिद्धार्थ कालेज की छात्र-परिषद ने 11 जनवरी, 1950 (बुधवार) को एक
छात्र-परिषद आयोजित की थी। संयोगवश डॉ. बी.आर. अम्बेडकर उस समय बंबई
में थे। उन्हें वहाँ हिंदू कोड बिल पर विशेष रूप से चर्चा के लिए बुलाया गया।
कार्यक्रम सुंदरबाई हॉल में रखा गया। हालांकि वह कार्यक्रम प्रातः 9.00 बजे शुरू
होना था, फिर भी हॉल प्रातः 8.00 बजे तक पूरी तरह खचाखच भर चुका था। डॉ.
बी.आर. अम्बेडकर को सुनने के लिए बाहर के अनेक प्रतिष्ठितजन भी उपस्थित थे।
लाउडस्पीकरों की विशेष व्यवस्था की गई थी। ख्1,
अपने भाषण में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने कहा :-
‘‘हिंदू कोड बिल को पूर्ण क्रांतिकारी कहना गलत होगा। उन्होंने कहा कि यह
बिल प्रगति के नये तरीकों की मंजूरी तो देता है, लेकिन रूढि़वादी रीति-रिवाजों का
विरोध नहीं करता। उन्होंने आगे कहा कि भारत के एक नये गणराज्य के संविधान में
एक सकारात्मक निदेश दिया गया था कि सरकार को संपूर्ण देश के फायदे के लिए
एक सिविल कोड तैयार करने का यत्न करना चाहिए। उन्होंने बताया कि हिंदू कोड
बिल का प्रयोजन हिंदू विधि की कुछ शाखाओं को संहिताबद्ध करना और संशोधित
करना है। उसकी महत्ता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि देश के एकीकरण
की दृष्टि से यह लाभप्रद है कि एक ही प्रकार के कानून हिंदू समाजिक और धार्मिक
जीवन में लागू होने चाहिए। उन्होंने अपने श्रोताओं से आगे कहा कि हिंदू कानूनों को
इसलिए पुनरीक्षित नहीं किया जा रहा है कि हिंदू उसके पुनरुत्थान का प्रतिरोध करने
के लिए कमजोर लोग हैं, बल्कि एकता की खातिर किया जा रहा है। हिंदू संहिता,
सिविल संहिता की दिशा में एक सही कदम है। कानून सहज, सुबोध होने चाहिए और
क्षेत्रीय अवरोधों को अनदेखा करते हुए संपूर्ण समाज पर लागू होने चाहिए। इसके
अतिरिक्त कोई हिंदू समाज में से किसी को भी गोद लेने के लिए स्वतंत्र है और वह
विरासत से इंकार करते हुए अपनी पुत्री के पक्ष में वसीयत कर सकता है।
जहाँ तक उस प्रामाणिक ग्रंथ का संबंध है जिसके अधीन संहिता का प्रारूप
तैयार किया गया है, उन्होंने कहा कि प्रस्तावित संशोधन हिंदू शास्त्र और स्मृतियों
पर आधारित है। संपत्ति दायभाग व्यवस्था से शासित होती है। पितृसवर्ण्य के अंतर्गत
बालक पिता की जाति का होता है : कौटिल्य और पाराशर स्मृति द्वारा तलाक का
समर्थन किया गया है। अंत में उन्होंने कहा कि संपत्ति पर, स्त्री के अधिकारों का
समर्थन वृहस्पति स्मृति में भी किया गया है। ख्2,
12 जनता, 14 जनवरी, 1950. कीर, पृष्ठ 417-418