376 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत फिर से गुलाम न
बने
दिनांक 11 जनवरी, 1950 को अर्थात् बुधवार की शाम नरेपार्क परेल में बंबई अनुसूचित जाति फेडरेशन की एक सभा में उस समय विशाल जन उत्साह देखा गया जब भारतीय संघ के संविधान के प्रारुपण के पीछे गतिशील शक्ति, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को एक पुस्तकाकार स्वर्ण मंजूषा भेंट की गई, जिसमें उस अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज की एक प्रति रखी थी।
वह सभा अनुसूचित जाति फेडरेशन के इतिहास में एक मील का पत्थर थी। उसमें दो लाख * से भी अधिक स्त्री-पुरुषों और बच्चों ने भाग लिया था। पार्क से लेकर मुख्य सड़क तक कंधे मिलाकर लोगों की भारी भीड़ जमा थी, जो इससे पहले कभी देखने में नहीं आई।
दलितों के विशाल जुलूस दोपहर बाद के शुरू में ही अनेक स्थानों से पार्क में एकत्र हुए। उनके हाथों में पार्टी के नीले झंडे थे और वे ऊँचे स्वर में जय-जयकार के नारे लगा रहे थे। भीड़ स्वयंसेवकों द्वारा संचालित की गई थी और विशेष अनुशासन रखा गया। जब डॉ. अम्बेडकर पाँच वर्ष बाद शहर में अपने प्रथम सार्वजनिक अभिनंदन में भाग लेने के लिए मंच पर चढ़े, तो लोगों का उत्साह देखते बनता था और अम्बेडकर की जयघोष के नारों से वातावरण गूंज उठा। कानून मंत्री को लगभग 50 मालाओं से लाद दिया गया। बाद में उनकी पत्नी डॉ. सविता अम्बेडकर भी आ गईं। सभा ने उनका भी उत्साहपूर्वक तालियाँ बजाकर स्वागत किया।
फेडरेशन द्वारा उगाहे गए चंदे से एक बहुत बड़ी सुसज्जित मंजूषा खरीदी गई थी। मंजूषा की कीमत चुकाने के बाद बचे दो हजार रुपए भी फेडरेशन के सचिव, श्री जे.जी. भटानकर द्वारा डॉ. अम्बेडकर को भेंट किए गए।
उपहार प्राप्त करने के तुरंत बाद, बोलते हुए डॉ. अम्बेडकर ने अतीत का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया। उन्होंने कहा :-
‘‘चूँकि हम सभी चुनावों में कांग्रेस से लड़ रहे हैं इसलिए कांग्रेसी मुझ से इतने नाराज हैं कि उनमें से कुछ तो खुलेआम कहते हैं कि वे किसी को भी संविधान
* जनता, 14 जनवरी, 1950