118. 2.5.1950 धर्म को हर व्यक्ति, विरासत से नहीं, बल्कि तार्किक ढंग से जांचे-परखे। - Page 402

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धर्म को हर व्यक्ति विरासत से नहीं, बल्कि तार्किक ढंग से

जाँचें-परखें

राजधानी नई दिल्ली, 2 मई, 1950 की रात को पूरे दक्षिण पूर्व एशिया के महान राष्ट्रीय और हित में, उस समय नाटकीय मोड़ आया जब भारत के विधि मंत्री, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने एक विशाल जनसभा में भगवान बुद्ध की तीन सौवीं वर्षगांठ पर बोलते हुए 7 करोड़ हरिजनों से बौद्ध धर्म अपनाने की माँग की।

बाद में डॉ. अम्बेडकर ने ‘भारत’ के प्रतिनिधि को बताया कि वह बौद्ध धर्म अपनाने जा रहे हैं। उस सभा में श्रीमती अम्बेडकर भी उपस्थित थीं।

यह भी प्रामाणिक रूप से ज्ञात हुआ कि लगभग 15 दलित अगले दिन दिल्ली में बौद्ध धर्म धारण करेंगे। पता चला कि इसी प्रकार के निर्देश डॉ. अम्बेडकर के देशव्यापी अनुयायियों को भी भेजे गए हैं।

एक दिन पहले भगवान बुद्ध के ‘परिनिर्वाण दिवस’ अर्थात् त्रियेक परमेश्वर के जन्म के वास्तविक दिन, डॉ. अम्बेडकर भगवान बुद्ध को अपना सम्मान और श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने के लिए स्थानीय ‘विहार’ भी गए थे।

एक उच्च बौद्ध भिक्षु के अनुसार, डॉ. अम्बेडकर ने वहाँ यह प्रार्थना की थी-

बुद्धमं शरणमं गच्छामि, घम्ममं शरणमं गच्छामि, संघमं शरणमं गच्छामि

उन्होंने बौद्ध धर्म के पाँच सिद्धांत भी स्वीकार किए, जो व्यापक रूप से विधिवत् अनुष्ठान जैसे माने जाते हैं।

बौद्ध पुनरुज्जीवन

जब डॉ. अम्बेडकर अपना भाषण दे रहे थे एक प्रथम पंक्ति के बौद्ध भिक्षु जो उस समय वहाँ उपस्थित थे ने कहा कि अब भारत स्वतंत्र हो गया है। बौद्ध धर्म पुनः स्थापित होगा। भारत में संभावित बौद्ध पुनरुज्जीवन की राजनीतिक महत्ता पर जोर देते हुए उन्होंने घोषणा की, कि भारत को अपनी स्वतंत्रता और आध्यात्मिक शक्ति की रक्षा के लिए बौद्ध धर्म की आवश्यकता पड़ेगी।

धारा-प्रवाह हिंदी में दिए गए अपने 30 मिनट के भाषण में डॉ. अम्बेडकर ने इस बात पर अधिक जोर दिया कि बौद्ध पुनरुज्जीवन भारत में शुरू हो चुका है। उन्होंने यह संकेत देकर अपने मत का समर्थन किया कि गणराज्य के राष्ट्रपति को जब ब्राह्मण धर्म में तलाशने से कुछ भी नहीं मिला, तो उन्होंने आजाद भारत के राष्ट्रध्वज पर अशोक चक्र के प्रतीक के लिए बौद्ध धर्म का सहारा लिया। डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा, साथ ही बौद्ध धर्म ने भारत गणराज्य को अपना त्रिसिंह