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मैं उस चट्टान की भाँति हूँ जो पिघलती नहीं, बल्कि नदियों
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने चुनाव अभियान के दौरान 27 अक्तूबर, 1951 को
रामदासपुर, जालंधर, पंजाब में भाषण दिया।
उन्होंने कहा-
‘‘प्यारे भाइयो और बहनो !
‘‘मुझे पहले भी पंजाब का दौरा करने का ख्याल आया था, लेकिन मैं यहाँ
नहीं आ सका और मुझे ज्ञात हुआ है कि जालंधर में अनेक लोग एकत्र हुए थे और
यह देखकर निराश हुए थे कि मैं वहाँ नहीं आया। आशा है आप सब को जो असुविधा
हुई, उसके लिए मुझे माफ करेंगे। हालांकि मेरे यहाँ न आने से बहुत सारे लोगों
को बहुत अधिक असुविधा हुई लेकिन मैं असहाय था और ऐसा निम्नलिखित कारणों
से हुआ था। पहला, कांग्रेस सरकार में अपने 4 वर्षों के दौरान मेरे पास सरकारी
काम का बहुत अधिक बोझ रहा और मुझे यहाँ आने का समय नहीं मिला। दूसरा,
इन सब वर्षों में मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहा और अब भी बहुत ठीक नहीं है।
तीसरा, पूरे भारत के अछूत चाहते हैं कि मैं पूरे भारत का दौरा करूँ और उनसे बात
करूँ। लेकिन आप भलीभाँति समझ सकते हैं कि हमारा देश इतना बड़ा ‘महाद्वीप’
है कि एक आदमी के लिए दो वर्ष में भी पूरे देश का दौरा करना संभव नहीं है।
इसलिए मैं लोगों की इच्छा पूरी नहीं कर सका, और जब वे मुझे चाहते थे तब मैं
यहाँ नहीं आ सका। इसलिए मैं चाहता हूँ कि हमारे सब लोग अपने पैरों पर पर
खड़े हों और संगठित हों ताकि वे मेरी सहायता के बिना तूफान का मुकाबला कर
सकें और मुझ पर बहुत ज्यादा जोर न डालें।
‘‘व्यक्ति को 55 वर्ष की आयु के पश्चात् राजनीति छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि
सरकार भी 55 वर्ष की आयु के बाद सरकारी सेवक को नोटिस दे देती है कि वह अब
सेवा के लायक नहीं रहा और उसे सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए। लेकिन वर्तमान युग
के राजनेता अपनी राजनीति 55 वर्ष की आयु के बाद शुरू करते हैं, ताकि वे अपनी
आजीविका कमा सकें, भले ही वे देश की सेवा करने में समर्थ हों या नहीं। उनके दिमाग
में केवल एक बात होती है, वह है अपने लिए कुछ प्राप्त करना। मेरा कोई स्वार्थ नहीं