124. 27.10.1951 मैं उस चट्टान की भांति हूं, जो पिघलती नहीं, बल्कि नदियों की दिशा बदल देती है। - Page 415

394 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है। मैं राजनीति में अपने स्वार्थ के लिए नहीं हूँ, बल्कि मैं अपने समाज की खातिर राजनीति में हूँ। मैं 1920 में राजनीति में आया था और तब से मैंने राजनीति में भाग लिया और इस समय तक मैं लगभग अपने जीवन के 30 वर्ष अपनी कौम की सेवा में बिता चुका हूँ। हालांकि मैं राजनीति छोड़ना चाहता हूँ, लेकिन समाज को संगठित करने की आवश्यकता को सोचकर मैं राजनीति में रहने के लिए बाध्य हूँ। इन 30 वर्षों में से 8 वर्ष मैं सरकार का सदस्य रहा। मैं नहीं जानता कि कोई ऐसा राजनेता है जो लगातार इतने लंबे समय तक राजनीति में रहा हो। मैं 8 वर्ष सरकार में रहा और यदि मैं चाहता तो हमेशा रह सकता था। मुझे इसका कोई अभिमान नहीं है। मैं जानता हूँ कि मेरी योग्यताओं को देखते हुए यदि मैं वहाँ रहना चाहूँ, तो मुझे कोई निकाल नहीं सकता लेकिन अपने समाज के लक्ष्य के कारण मुझे कांग्रेस सरकार की सदस्यता से त्यागपत्र देना पड़ा। मैं आप लोगों को भरोसा दिलाना चाहता हूँ, कि मैं जहाँ कहीं भी जाता हूँ मेरे मन में अपनी जाति की भलाई हमेशा रहती है।

‘‘जब मैं पीएचडी की डिग्री लेकर इंग्लैंड से आया था, तो भारत में किसी के पास ऐसी योग्यता नहीं थी। इसलिए जब मैं बंबई पहुँचा और उस मुहल्ले में रहने लगा जहाँ से मैं गया था तो बंबई सरकार ने बड़ी कठिनाई के बाद मेरा घर ढूंढा क्योंकि कोई भी नहीं जानता था कि मैं कहाँ रहता हूँ। वह एक अनजान जगह थी, और सरकार ने मुझसे पॉलिटिकल इकोनॉमी के प्रोफेसर का पद स्वीकार करने के लिए कहा, लेकिन मैंने इंकार कर दिया। यदि मैं वह पद स्वीकार कर लेता, तो मैं कम से कम पब्लिक इंस्ट्रक्शन्स का निदेशक होता। मैंने उस पद को लेने से इसलिए इंकार कर दिया था, क्योंकि मेरे मन में अपने समाज की सेवा करने की उत्कट भावना थी जो मैं उस नौकरी में रहकर नहीं कर सकता था। आप जानते हैं कि कोई भी सरकारी सेवक अपने समाज की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि उसे सरकार की इच्छाओं के अनुसार चलना होता है और सरकार की नीति का अनुसरण करना होता है।

‘‘दो-तीन वर्ष कुछ धन कमाने के बाद मैं उच्च अध्ययन के लिए पुनः इंग्लैंड गया और बैरिस्टर बनकर लौटा। जब मैं बंबई पहुँचा, तो पुनः बंबई सरकार ने मुझ से जिला न्यायाधीश का पद स्वीकार करने के लिए कहा। मुझे 2000/- रुपए प्रतिमास देने की पेशकश की गई और यह वायदा किया गया कि मैं कुछ समय बाद उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बन जाऊँगा लेकिन मैंने उसे भी स्वीकार नहीं किया, हालांकि उस समय अन्य स्रोतों से मेरी आय केवल 200/- रुपए थी।

‘‘सन् 1942 में, मेरे सामने दो सवाल थे, एक था उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में सेवा करना और दूसरा था वायसराय की कार्यकारी परिषद् के सदस्य के रूप में भारत सरकार में शामिल होना। यदि मैं उच्च न्यायालय में चला जाता,