468 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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जब तक वर्ग विहीन और जाति विहीन समाज का निर्माण
नहीं होता, भारत में कोई प्रगति नहीं होगी।
‘‘संघ सरकार के पूर्व विधि मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने बुधवार 27 मई, 1953 को मुबंई में कहा कि अपने शेष जीवन को वह बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार में लागाएंगे।
नारे पार्क मैदान में भगवान बुद्ध का जन्मदिन मनाने के लिए अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन के तत्वाधान में आयोजित सभा को संबोधित करने के दौरान डॉ. अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था की भर्त्सना की और कहा कि जब तक वर्गविहीन और जातिविहीन समाज का निर्माण नहीं होता, देश में कोई प्रगति नहीं होगी।
वे यह देखकर काफी प्रसन्न हुए कि इस समारोह में भारी संख्या में हिन्दू भी भाग ले रहे थे। उनको पूर्ण विश्वास था कि भारत में बौद्ध धर्म का तेजी से प्रसार होगा।
बुद्ध का जन्मदिन मनाने वाले अन्य संगठनों में बुद्धा सोसायटी तथा बौद्ध धर्म प्रचार समिति भी थे।
बुद्ध जंयती के अवसर पर बंबई में भारत सरकार के कार्यालय बुधवार को बंद रहे।
यह दिन डाक अवकाश का भी दिन था। चूंकि इस दिन सरकारी छुट्टी नहीं थी इसलिए राज्य सरकार के कार्यालय और बैंक रोज की भांति खुले रहे।’ ख्1,
सभा की सी.आई.डी. रिपोर्ट निम्नवत् है -
‘‘27 मई 1953 को नारे पार्क, परेल, में बुद्ध धर्म प्रचार समिति के तत्वाधान आयोजित एक सभा की अध्यक्षता डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने की। सभा के 5000 श्रोताओं को संबोधित करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म में कई बिंदुओं पर मतभेद है और उनके हिन्दू धर्म में रहते हुए, हरिजनों की स्थिति में सुधार नहीं होगा। उन्होंने यह घोषणा भी की कि बौद्ध धर्म का प्रचार करते रहने का उन्होंने दृढ़ निश्चय कर लिया है।’’ ख्2,
1 द नेशनल स्टैंडर्ड, 28 मई, 1953
2 बाम्बे सिटी, एम.बी., सी.आई.डी. 27 मई, 1953