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अनुसूचित जातियों के नेता डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 2 मई, 1953 दिन शनिवार को बंबई में युवा सभा से गुजारिश की कि वे जनता में जाकर उन्हें उनकी अंधविश्वास की विरासत से छुटकारा दिलायें।
वह सिद्धार्थ कॉलेज में सभा के ग्रीष्मकालीन स्कूल का उद्घाटन कर रहे थे। मात्र अकादमिक कुशलता पर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने आधुनिक युवाओं से कहा कि वे एक या दो समकालीन समस्याओं को चुनकर तर्कसंगत ढंग से उनका समाधन करें।
विद्यार्थी जगत में घुसपैठ कर लेने वाली विभिन्न विचारधाराओं जिनकी वजह शायद विदेशी प्रभाव थे, जिससे वे हतप्रभ रह गये थे। उन्होंने सभा से कहा कि वे निश्चित उद्देयों को लक्ष्य करके एक योजना बनाएं और अगर इससे कुछ ठोस परिणाम प्राप्त हों तो वे दर्शन और यूरोपीय के व्याख्यानों को छोड़ सकते हैं।
डॉ. अम्बेडकर ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर तथाकथित उच्च वर्गों ने तत्काल ही वर्तमान स्थितियों का संतुलित मूल्यांकन नहीं किया तो उनका ‘सफाया हो जाएगा।’
उन्होंने टिप्पणी की कि अब समय आ गया है कि विद्यार्थियों को छोटे-छोटे समूहों में जनता के बीच जाकर उन्हें तर्कसंगत जीवन जीने की शिक्षा देनी चाहिए।’’
उन्होंने आधुनिक समाज को ‘विरूपित’ समाज की संज्ञा देते हुए कहा कि यह बयान आधुनिक समय में पुरातन आदर्शों को जी रहा है।
उन्होंने कहा कि हमने एक ऐसा संविधान स्वीकार कर लिया है जो वास्तविक रूप में हमारी जीवन पद्धति को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों और नियमों के सर्वथा भिन्न है।
युवा सभा के अध्यक्ष डॉ. बी.जी. गोखले ने डॉ. अम्बेडकर का स्वागत किया।