474 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चमत्कार दिखा सकता हो, ऐसा चमत्कार जो जन-साधारण के ज्ञान के परे हो। और इस तरह का चमत्कार करने वाले ईश्वर बन गये। यह सब हमें भारत में मिलता है। आज भारत में ऐसा कोई धर्म नहीं है। जिसमें मूर्तियों, साधुओं, संतों और चमत्कार दिखाने वालों की उपासना न होती हो। आज के हमारे धर्म में न तो ईश्वर है और न ही नैतिकता। मुझे कोई संदेह नहीं है कि यह स्थिति मानव मस्तिष्क की पतित स्थिति है और आने वाली पीढि़यों के लिए यह एक जिम्मेदारी है कि वे धर्म को उसके शुद्ध और दयालु स्थिति में वापस ले आएं। इस बीच हमें तथ्यों को उस रूप में दृष्टिगत करना होगा जैसे वे हैं। हम धर्म के मामले में केवल भटक ही नहीं गये हैं, बल्कि धर्म के नाम पर पैसा उगाह कर उसे ऐसी चीजों के लिए बर्बाद करना एक व्यवसाय बन गया है जिसका कोई सामाजिक स्पष्टकीरण नहीं है। संसार में इतनी निर्धनता, इतना दुख है कि धर्म के नाम पर पैसा इक्ट्ठा करना और उसे ब्राहा्रणों एवं तीर्थयात्रियों को खिलाकर बर्बाद करना अपराध है।
बुद्ध ने इस प्रश्न पर भली-भांति विचार किया है। अपनी नैतिक संहिता में बुद्ध ने पंचशील, अष्टांग मार्ग और निब्बान का उपदेश दिया। लेकिन इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने अनुयायियों को दस गुण विकसित करने की भी शिक्षा दी-(1) प्रज्ञा (2) शील (3) नेखम्म (4) शील (5) वीर्य (6) खन्ति (7) सच्च (8) अधित्थान (9) मैत्री (10) उपेक्खा।
प्रज्ञा का अर्थ है बुद्धि, ज्ञान का वह प्रकाश जो अज्ञान या अविद्या का अंधकार समाप्त करती है, मोह नव-विज्ञान है। शील का अर्थ नैतिक स्वभाव है, अच्छा होने का और बुरा न करने का स्वभाव। नेखम्म सांसारिक सुखों का परित्याग करता है। दान का अर्थ बिना कुछ पाने की इच्छा किये अपनी समस्त भौतिक उपलब्ध्यिं से लेकर शरीर एवं जीवन का दान कर देना। वीर्य का अर्थ है सच्चा प्रयत्न-पीछे हटने के बारे में सोचे बिना जो कुछ भी आपने करने का जिम्मा लिया है उसको अपनी पूरी शक्ति से करना। खन्ति का आशय है सहिष्णुता, घृणा का उत्तर घृणा से न देना। सच्च है सत्य, किसी व्यक्ति को कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए जो वह कहता है वह केवल सत्य होना चाहिए, सत्य के सिवाय कुछ भी नहीं। अधित्थान का तात्पर्य लक्ष्य प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय है। मैत्री का तात्पर्य है सभी जीवों से प्रेम करना, केवल मित्रों से ही नहीं, बल्कि शत्रुओं से भी, केवल मनुष्यों से नहीं, बल्कि सभी जीवों से। उपेक्खा का अर्थ वैराग्य है जो कि उदासीनता से अलग है। इसका अर्थ है मन की वह दशा जिसमें ना तो आसक्ति है और न विरक्ति परिणामों से अविचलित रहकर कार्य साधना में लीन रहना। इसलिए पालि साहित्य में उन्हें पारमिताएं कहा जाता है।