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भले ही बुद्ध ने दान पारमिता का उपदेश दिया था, किंतु उन्होंने खासतौर पर यह उल्लेख किया है कि दान सुपात्र को ही किया जाना चाहिए। दान देते समय यह दाता को जब श्रेष्ठ बनाती हो तो पाने वाले को यह पतित न करती हो। दान उन लोगों को दी गयी सहायता है जो गिर गये है ताकि वे जीवन के मार्ग पर स्वावलंबित होकर चल सकें।
यदि आपने उस संत के नाम पर पैसा इक्ट्ठा किया है जिनका आप सम्मान करते हैं तो आपको यह पैसा ऐसे कार्यों में लगाना चाहिए जो पारमिताओं में बताये गये हैं। संसार में इतना दुख, इतनी अज्ञानता और इतने कष्ट हैं कि, जैसा कि मैंने कहा, संपन्न लोगों को खिलाने के लिए इसका प्रयोग करना निर्दयता होगा। इस तरह के दान स्वरूप प्राप्त धन का प्रयोग अस्पतालों के लिए, शिक्षा के लिए, छोटे-छोटे उद्योग लगाने के लिए जिससे बेसहारा लोगों, विधवाओं को काम मिल सके, के लिए किया जाना चाहिए। अगर आप लोग मेरे विचारों से सहमत है तो इसके अतिरिक्त भी कई उदाहरण हैं जिनका अनुसरण आप कर सकते हैं, आपको बस व्यावहारिक उदाहरणों के लिए अपने आसपास देखने की आवश्यकता भर है।
मुझे याद है कि मैंने आप लोगों के चिंतन के लिए कुछ विचार दे दिए हैं। यदि आपने पैसा एकत्रित किया है तो इसका प्रयोग वैसे ही करें जैसा मैंने बताया है। इससे आपका ही भला होगा, इसमें सांई बाबा का नाम भी उज्जवल होगा।’’ ख्1,
1 बंबई में जनवरी, 1995 का आयोजित सांई सम्मेलन में परिचालित एक मुद्रित पुस्तिका स लकर
पुनर्मुदित