परिशिष्ट-I डॉ. बी.आर. अम्बेडकर द्वारा धर्मांतरण की घोषणा पर गांधी जी का लेख। - Page 550

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परिशिष्ट-1

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर द्वारा धर्रमांतरण की घोषणा पर

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गांधीजी का लेख

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हरिजन में 26 अक्तूबर, 1935 को ऑन इट्स लास्ट लेग, शीर्षक से प्रकाशित इस लेख में गांधीजी ने बताया था :-

‘‘कुछ आलोचक यह कहने से हिचके नहीं है कि डॉ. अम्बेडकर की यह धमकी कि एक हिंदू के तौर पर मरने के बजाए वह किसी अन्य धर्म को स्वीकार कर लेंगे, के उत्तर में मेरे यह दावा करना निरर्थक था कि कविथा के बावजूद, छुआछूत अपने अंतिम चरण में है। वास्तव में मेरे दावे का समर्थन कविथा स्वयं करती है। कविथा अपने जन्म से तब तक शांतिपूर्वक रहती रही है, जब तक कि अपनी सीमाओं को न जानते हुए किसी अति उत्साही कार्यकर्ता ने कविथा हरिजनों को अपने बच्चों को स्थानीय स्कूलों में भेजने की चुनौती नहीं दे डाली, हालांकि वह जानता था कि कुछ सवर्ण उसका विरोध करेंगे। दूसरी जगहों की तरह उसने यहां भी आशा की थी कि हरिजन अपने बच्चों को सार्वजनिक स्कूलों में भेजने के अपने अधिकार की रक्षा करेंगे। लेकिन कविथा सवर्णों ने यह दिखाया कि वे समय की भावना को मान्यता नहीं देते।

‘‘कुछ वर्ष पहले तक कविथा की घटना पर किसी का ध्यान नहीं जाता! तब केवल थोड़े-से सुधारक थे। ये थोड़े-से अधिकतर कस्बों और शहरों में मिलते थे। अब भगवान की कृपा से उनकी संख्या बढ़ रही है और अब वे प्रत्येक गांव में मिलते हैं। लेकिन कुछ पहले हरिजनों को किसी भी हालत में छुआछूत का विरोध करने को प्रेरित नहीं किया जा सकता था। सवर्णों की ही तरह यही भी उनकी आस्था का अंग था। इन स्तंभों में छुआछूत के खिलाफ अभियान की साप्ताहिक प्रगति के पर्याप्त प्रमाण हैं। हालांकि असाधारण प्रगति हुई है, पर कविथा और ऐसी ही घटनाओं से प्रदर्शित होता है कि अनेक स्थानों पर इसका प्रभाव अधिकांश सवर्णों पर नहीं पड़ा है। यह तथ्य सुधारकों तथा हरिजनों के लिए चेतावनी है कि सवर्णों के कठोर हृदयों को पिघलाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना है।

‘‘आगे यह कहा जाना चाहिए कि कविथा त्रासदी को समाने लाने और उसे अखिल भारतीय महत्व देने का काम सवर्ण सुधारकों ने ही किया था। मैंने सवर्ण चेतना को हरिजनों के क्रोध से अधिक आंदोलित किया है। मुझे शर्म और दुख के