परिशिष्ट-I डॉ. बी.आर. अम्बेडकर द्वारा धर्मांतरण की घोषणा पर गांधी जी का लेख। - Page 551

530 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

साथ यह नोट करना पड़ता है कि अब कविथा के हरिजन अपने अधिकारों के लिए आंदोलन नहीं करना चाहते हैं। उनकी सहायता करने के तमाम प्रस्तावों के बावजूद वह कविथा नहीं छोड़ेंगे। ईमानदारी के साथ मेहनत करके कहीं दूसरी जगह अपनी रोजी-रोटी कमाना केवल कुछ के लिए आसान है। सुधारकों ने अपनी सुरक्षा में उनको कविथा छोड़ने को प्रेरित करने के जो प्रयास किए थे, वे असफल रहे है।

‘‘धर्म की जन्मजात अपर्याप्तता के चलते नहीं, बल्कि उसके अनेक अनुयायियों के विवेकहीन पूर्रवाग्रहों के कारण, यदि धर्मांतरण सही हो तो भी वर्तमान उदाहरण में यह उस उद्देश्य को विफल कर सकता है जिसकी यह सेवा करना चाहता है। डॉ. अम्बेडकर जैसे साहसी लोगों के अलग होने से हरिजनों की प्रतिरक्षाएं केवल कमजोर पड़ती है। हम जानते हैं कि गैर-हिंदू हरिजन, चाहे वह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, हिंदू हरिजनों की मदद नहीं कर पाएगा। अपने अपनाए हुए धर्म में वे अब भी बहुत अलग हैं। भारत के लोगों पर भारतीय प्रकार की छुआछूत का इतना अधिक प्रभाव है।

‘‘ डॉ. अम्बेडकर के क्रोध से सुधारक को निरुत्साह नहीं होना चाहिए, उसको और अधिक प्रयास करने चाहिए। क्योंकि जहां यह सही है कि छुआछूत विरोधी कार्यकताओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, वही इसमें कोई संदेह नहीं कि युगों के पूर्वाग्रहों पर काबू पाने के लिए यह संख्या अब भी बहुत छोटी है। फिर भी कोई भी अभियान, जिसने छुआछूत विरोधी अभियान का आकार ले लिया है, और जिसमें छोटी-सी भी अप्रिय घटना सारी दुनिया का ध्यान खींच सकती हो, तो केवल अपने अंतिम चरण में ही हो सकता है। मानवता अब और अधिक समय तक दुख नहीं झेल सकती है।’’ ख्1,

21 मार्च, 1936 के हरिजन में प्रकाशित लेख में बापूजी के विचार :

‘‘डॉ. अम्बेडकर ने धर्मांतरण की धमकी के रूप में हिंदू समाज के बीच जब से एक बम-सा फेंक दिया है, उनको प्रस्तावित कदम उठाने से रोकने के लिए जबरदस्त कोशिशें की जा रही है। डॉ. अम्बेडकर की धमकी का प्रभाव उन हरिजनों पर भी पड़ा है जो साक्षर हैं और अखबार पढ़ सकते हैं। उन्होंने पदों, वजीफों या ऐसी ही मांगों के साथ हिंदू संस्थाओं या सुधारकों से बात करना शुरू कर दिया है। और उनके साथ यह लिखा है कि उनकी मांग को अस्वीकार किए जाने की स्थिति

1 भारत सरकार, महात्मा गांधी की संकलित रचनाएं, प्रकाशन, विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली, खण्ड एलएक्स 11, पृष्ठ 64-65 पुनमुर्दित विस. डॉ. पृष्ठ 299-301