5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 56

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यह है कि लोक सेवा में सभी जाति, धर्म व दलित वर्ग का एक उचित मिश्रण हो, इसके लिए हमें दबाव बनाना होगा। हमें लोक सेवा में किसी प्रतिशत तक दलित वर्ग के लिए सुरक्षित स्थान रखे जाने की मांग उठानी चाहिए और संविधान में इस बात की गांरटी का प्रावधान रखने में कोई कठिनाई नहीं होगी। अगर दलित वर्ग से देश में आने वाली सरकारों में मंत्रियों का प्रतिनिधित्व निश्चित होता है तो इस प्रकार के संरक्षण व बचाव के प्रावधान की कोई आवश्यकता नहीं होती। परन्तु यह तो अंसभव प्रतीत होता है, क्योंकि दलित वर्ग सदैव अल्पसंख्यक ही रहने वाला है। इस लिए यह अति आवश्यक हो जाता है कि आप ऐसी गांरटी के लिए अड़ें।

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  1. मैंने कई सारे रक्षोपायों की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जिनको मैं आपके लिए स्वशासित भारत में अत्यावश्यक मानता हूँ। साइमन आयोग ने हमारे संबंध में अनुमोदन किये हैं, अब मैं उन पर चर्चा करूंगा। निस्संदेह साइमन आयोग ने दलित वर्ग के संवैधानिक संरक्षण के लिए सहानुभूतिपूर्वक विचार किया है। आयोग ने दलित वर्ग की दशा के सही चित्रण का प्रयास किया है परन्तु यहां दशा चित्रण किसी भी प्रकार पूर्ण चित्रण नहीं है। उन्होंने विद्यालय व कुएं की समस्या के बारे में लिखा है। इन अभागी जातियों की शिकायतों की लम्बी सूची में से यह एक छोटा अंशमात्र है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि दलित वर्ग के संरक्षण के लिए साइमन आयोग द्वारा सुझाये गये संवैधानिक संरक्षण प्रावधान व आवश्यकता को साइमन ने मोन्टफोर्ड रिपोर्ट से कहीं अच्छे से समझा है। परन्तु मैं बड़े खेद से यह कहना चाहता हूँ कि हमारे प्रतिनिधित्व के लिए सुझाया ढंग तथा हमारा प्रतिनिधित्व कितना हो; इसके अनुमोदन के विषय पर साइमन ने हमें बहुत ही निराश किया है।

  2. जैसा आपको विदित है कि वर्तमान में दलित वर्ग के प्रतिनिधि मनोनीत किए जाते हैं। हममें से वे जो दुर्भाग्यवश मनोनयन द्वारा आपके प्रतिनिधि बने इस मनोनीत प्रणाली के दुष्परिणामों से आपको अवगत करायेंगे। मुझे यह कहते प्रसन्नता हो रही है कि पूरे भारत से साइमन आयोग के सामने साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए इस प्रणाली की व्यापक भर्त्सना की गई। इस प्रणाली के अंतर्गत हमारे लोगों को अपनी पंसद के तथा योग्य प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से वंचित रखा जाता है यह उनकी स्वतंत्रता का हनन है। इसी प्रकार हमारे मनोनीत प्रतिनिधियों को कार्य करने में कोई स्वतंत्रता नहीं है। यह खेद की बात है कि साइमन आयोग ने इतने पर भी इस दुष्टतम प्रणाली को नहीं