5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 55

34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

स्वशासक समुदाय नहीं बन सकते। अल्पसंख्यकों को यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यद्यपि आज के समय हम धर्म व सम्प्रदाय के नाम पर बिखरे हुए हैं, परन्तु हमारा आदर्श एक संगठित राष्ट्र बनना है। कोई भी अल्पसंख्यक समुदाय जो यह चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जानी चाहिए इस आदर्श को सबसे प्रथम दर्जे पर रखने में कोई चूक न करें। इस तर्क से यह बात निकलती है कि सभी अल्पसंख्यक समुदायों के लिए यह अतिआवश्यक है कि अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए बनाए गये नियमों व प्रावधान हमारे आदर्श यानी ‘‘एक संगठित राष्ट्र’’ बनने में कहीं आड़े न आए। आप अपने संरक्षण के लिए बनाए प्रावधानों के प्रति जागरूक रहें क्योंकि आज के दिन असमानता एक वास्तविकता है और संरक्षण द्वारा हमें असमानता की दूरी को पाटना है। नियम या प्रावधान कहीं ऐसे न बन जाएं कि असमानता चिरस्थाई बन जाए व हम हमेशा के लिए पंगु बन कर इन प्रावधानों को बैसाखियां मानकर इनके मोहताज हो जाएं। निस्संदेह बहुसंख्यक समुदाय पर अल्पसंख्यकों के संरक्षण का एक बड़ा उत्तरदायित्व है। इसके साथ ही अल्पसंख्यकों पर भी एक भारी उत्तरदायित्व है कि वे ऐसे संरक्षण नियमां के लिए न अड़ें जिससे सब की एकता में बाधा उत्पन्न होती हो। इस दृष्टिकोण से संयुक्त निर्वाचन मण्डल के साथ आरक्षित सीटों वाली योजना अलग-अलग निर्वाचन मंडल की योजना से बेहतर है। क्योंकि यह आज की वास्तविकता को पूरा करता है और भविष्य में आदर्श के प्रति भी सहायक है।

  1. दलित वर्गों के संरक्षण के बारे में एक और महत्वपूर्ण बात है। यह उनके लोक सेवा में प्रवेश के बारे में है। विधायिकाओं द्वारा विधि बनाने की शक्ति से विधि अनुसार प्रशासन चलाना कम महत्वपूर्ण नहीं है। प्रशासन के कुचक्र से बड़ी आसानी से विधि में निहित भावना का अगर अतिक्रमण न भी किया जाए परन्तु उल्लंघन तो किया ही जा सकता है। दलित वर्ग को प्रशासन शक्ति पर काबू पाना केवल इसीलिए महत्वपूर्ण नहीं है। प्रायः काम की अधिकता का दबाव या विशिष्ट परिस्थितियों में विधि में बहुत सी बातें विभाग के मुख्यअधिकारी की समझ व सूझ-बूझ से निर्णय लेने के लिए छोड़नी पड़ती हैं। लोक हित व कल्याण अधिकारियों द्वारा उनकी समझ से लिए गये निष्पक्ष निर्णयों पर निर्भर करते हैं अर्थात निष्पक्षता किस प्रकार की है। भारत जैसे देश में जहां लोक सेवा में एक समुदाय का विशेष प्रकार से आधिपत्य बना हुआ है इस सूझ-बूझ के दायरे में लिए गए निर्णयों के बारे में इस शक्ति का वर्ग विशेष द्वारा सम्पदा बनाने या अनुचित लाभ उठाने के लिए अति-दुरुपयोग का भय आंशका मात्र नहीं है। इसका हल केवल