5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 69

48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आध्यात्मिक और वित्तीय स्थिति में प्रगति देखने को उतावले हैं तो हम केंद्रीय सरकार के उत्तरदायित्व के प्रश्न की अनदेखी नहीं कर सकते। परन्तु एक और कारण है जो इसी उत्तर की ओर इंगित करता है। राज्य सरकार की कार्यपालिका कानून तथा व्यवस्था बनाए रखने में केन्द्रीय सरकार के महत्वशाली अभिकर्ता की भूमिका वहन करती रहेगी। अगर दोनों को एक दूसरे की ताल से ताल मिलाकर कार्य करना है तो यह अत्यावश्यक है कि उन्हें आदेश एक ही स्रोत से प्राप्त हों। इसके बगैर दोनों में घोर विवाद होगा। एक राज्य का अधिकारी जो राज्य की विधानसभा का उत्तरदायी हो वह सम्भवतः केन्द्रीय सरकार से आदेश नहीं ले सकता विशेषतया जब केन्द्रीय सरकार की कार्यपालिका अपने कार्य के लिए केन्द्रीय सदन का उत्तरदायी न होकर राज्य सचिव के अधीन कार्यरत हो। ऐसे विवाद की स्थिति में आपदा के समय देश का प्रशासन बिल्कुल शक्तिहीन हो सकता है। इसलिए, आप कभी केवल राज्य कार्यपालिका को उत्तरदायी नहीं बना सकते इसके लिए चाहे इच्छा से चाहे अनिच्छा से कुछ सीमा तक केन्द्रीय कार्यपालिका को ही उत्तरदायी बनाना होगा।

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  1. सज्जनो, चाहे हम संरक्षण के साथ डोमिनियन स्थिति में स्वशासन को समर्थन देने की बात करें तो क्या इससे यह अर्थ निकलता है कि महात्मा गाँधी द्वारा पिछले वर्ष मार्च से शुरू किये गये ‘‘नागरिक अवज्ञा आन्दोलन’’ में हमें भाग लेना चाहिए? इस प्रश्न पर हमें अपनी राय स्पष्ट करनी होगी। जैसा कि आपको ज्ञात है कि सभी नरम दल वालों ने इस आन्दोलन की निन्दा की है तथा इसे असंवैधानिक का दर्जा करार दिया है। मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे उनका तर्क प्रभावित नहीं करता। अगर यह रूढि़वादी वर्ग आपसे कहता कि ‘‘तुम्हारा यह मंदिरों में प्रवेश आंदोलन असंवैधानिक है तो आप क्या कहोगे?’’ कि सीधे मंदिरों में प्रवेश को त्याग कर रूढि़वादियों से अनुरोध करो, कोर्ट कचहरी में अर्जी दो और कानून में परिवर्तन कराओ। क्या आप अपने रूढि़वादिता के विरूद्ध स्वतंत्रता संग्राम में अपने उपयोग में लाने वाले अस्त्र-शस्त्र को इस तर्क से प्रभावित होकर लगाम लगाने को सहमत हो जाओगे? मुझे लगता है कि आप संवैधानिक उपाय की शरण तभी ले सकते हैं अगर पहले ही स्वीकृत संविधान लागू हो। परन्तु अगर कोई संविधान हो ही नहीं तो कोई भी संवैधानिक उपाय को ईश्वर का उपदेश मानने को कतई तत्पर न होगा। यह तर्क ब्रिटिश के दिल और दिमाग में न आएगा ऐसा नहीं