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है। क्योंकि अल्सतर आंदोलन भी तो क्या नागरिक अवज्ञा आन्दोलन नहीं था? तो क्या जाने माने ब्रिटिश राजनीतिज्ञों ने इसमें भाग नहीं लिया और क्या आन्दोलनकारियों को प्रोत्साहित नहीं किया? प्रश्न यह है कि क्या यह चुना गया मार्ग हमारे लोगों के हितों की सुरक्षा व संरक्षण के साथ-साथ एक अनुकूल अवसर व अस्त्र हैं? मैं नागरिक अवज्ञा आंदोलन का विरोध करता हूं। क्योंकि मैं निश्चित ही इसे अत्यंत प्रतिकूल अवसर मानता हूं। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सभी बुराईयों से इन्कार करते हुए भी मुझे इसमें भारतीयों की उन्नति की आशा लगती है। ऐसी धारणा वाला मैं अकेला नहीं हूँ। यह महात्मा गांधी की सोच है जिनकी यह घोषणा है कि भारत में सत्तारूढ सरकार के विरुद्ध राजद्रोह करना उनका प्रतिबद्ध कर्त्तव्य है। ब्रिटिश प्रभुता के तहत भारत को स्वशासित बनाना ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य है तथा 1920 में इस भावना को सत्यता में परिवर्तित करने के लिए राज्यों के उत्तरदायित्व से एक शुरूआत की जिससे धीरे-धीरे भारत में स्वशासन लाया जा सके। शायद वास्तविकता उद्देश्य से ज्यादा बौनी रह गई। शायद उद्देश्य की ओर बढ़ने की गति बहुत धीमी रह गई थी। परन्तु क्या इसे दिए गए वचन से फिरना कहा जा सकता है? अगर यह वचन से फिरना था तब तो अवज्ञा आन्दोलन में कुछ अनुकूल अवसर की चाल समझ आती है। परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं था। वायसराय की डोमिनियन पा्रस्थिति स्वशासन की घोषणा उद्देश्य को स्पष्ट भाषा में व्याख्या करती थी और भारतीयों को गोल मेज सभा में बुलाकर उद्देश्य की शीघ्र प्राप्ति के रास्ते तलाशने का एक अवसर दिया गया था। यह भी एक सत्य है कि वे सब जो तुरन्त प्रभाव से डोमिनियन पा्रस्थिति स्वराज चाहते थे उनके दृष्टिकोण से इसमें कुछ कमियां थी। परन्तु केवल इस आधार पर गोल मेज सभा के न्योते को ठुकरा देना पर्याप्त कारण नहीं था। वायसराय या ब्रिटिश कैबिनेट मंत्रियों से वचनबद्धता या काम का जिम्मा लेकर असमर्थता के बिन्दुओं पर लड़ाई मुझे आवश्यक और अनुपयोगी लगती है। किसी ने जिम्मा लिया हो या न लिया हो अगर भारत की स्वशासन की मांग एक स्वर में उठती है तो कोई कारण नहीं कि इसका प्रभाव ब्रिटिश पार्लियामेंट पर न पड़े। कुछ भी हो अगर कांग्रेस गोल मेज सभा का न्यौता स्वीकार कर लेती तो कुछ खो तो नहीं जाता। गोल मेज सभा की वार्ता असफल होने का प्रभाव केवल अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत एक वर्ष बाद होने पर रहता और इससे कांग्रेस का प्रभाव बढ़ता। वे लोग जो केवल सही या गलत के विश्वास में जीते हैं वे संभवतः मार्ग से भटक कर निराश हो जाएंगे। सभी बिन्दुओं पर विचार कर मैं यह कहने को विवश हूं कि इस