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अपार जन समूह के सामने जब उनके अपनों ने प्यार व कृतज्ञता दर्शाई तो डॉ. अम्बेडकर बहुत प्रभावित हुए और मंत्रमुग्ध से एक पल के लिए कुछ अचंभित और मूर्तिवत हो गये। एक विराम के पश्चात उन्होंने जनसमूह के सामने घोषणा की, ‘‘मैं जो भी सेवा दे पाया हूँ वह सब कार्यकर्ताओं के सहयोग व लोगों के निडर समर्थन का ही फल है’’। उन्होंने कहा कि किसी ध्येय की प्राप्ति या उसकी असफलता के लिए कोई नेता उत्तरादायी नहीं होता, इसलिए अपना संघर्ष बनाए रखें। जहां तक उनका अपना प्रश्न है उन्होंने कहा आखिर वे भी एक मनुष्य है और मानव तो गलतियों का पुतला है। संभवतः, वे कभी पक्षपात कर गये हों। परन्तु उसके लिये उन्हें क्षमा किया जाए।
उन्होंने कहा, ‘‘मैंने गांधी का विरोध किया, इसलिए कांग्रेसी मुझे देशद्रोही की संज्ञा देते हैं। मैं इससे व्याकुल नहीं होता, क्योंकि यह दोषारोपण निराधार, झूठा व दुर्भावना से प्रेरित है। परन्तु दुनिया के लोगों की सोच को एक झटका तब लगा जब गांधी ही आप लोगों की गुलामी की बेडि़यां कटने के हिंसक विरोधियों के प्रवर्तक बने। मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि हिन्दुओं की आने वाली पीढि़यां जब गोलमेज अधिवेशन का इतिहास पढेंगी तो वे मेरी सेवाओं को सराहेंगी’’ उन्होंने भेद खोला कि कैसे वे लन्दन में गांधी से चार या पांच बार मिले, कैसे गांधी बड़े रहस्यमय ढंग से पवित्र कुरान पुस्तक हाथ में लिए आगा खां से मिले व दलित वर्ग को समर्थन वापस लेने को कहा और कैसे आगा खां ने ऐसा करने से इन्कार किया * । अन्त में उन्होंने अपने समर्थकों से अनुरोध किया कि वे उन्हें को पूज्य न बनायें, क्योंकि वे स्वयं पूज्य बनाने के क्रम से घृणा करते हैं। सभा समापन के समय उन्होंने नासिक वीरों का सम्मान किया जो तब तक जेल से छूट चुके थे। ख्1,
‘‘डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने श्रोतागण का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि अगर उन्हें सात करोड़ अछूतों का मजबूत समर्थन न मिला होता तो वे गोलमेज अधिवेशन में दलित वर्ग का पक्ष न रख पाते। उन्होंने अपने तथा कुछ विषेष दलित वर्ग के मतभेद का उल्लेख किया तथा उन्होंने विश्वास दिलाया कि वे पूरे दलित समुदाय के हितों को सुरक्षित रखने वाली किसी भी योजना को स्वीकारने को तैयार हैं। गांधी जब दलितों से वार्ता कर रहे थे तो साथ ही साथ अल्पसंख्यकों की समस्या लेकर रहस्यमय ढंग से मुसलमानों से सांठ गांठ में लगे होने को लेकर उन्होने गांधी के दृष्टिकोण की आलोचना की। उन्होंने श्रोताओं को सदैव अपनी शक्ति पर भरोसा रखने को कहा तथा किसी नेता पर आश्रित न होने की सलाह दी। अन्त में उन्होंने नासिक मंदिर में प्रवेश करने वाले सत्याग्राहियो को बधाई दी। ख्2,
* 12 कीर, पृष्ठ 193. बम्बई नगरी एस.बी., जनवरी 30, 1932जनता : जनवरी, 30, 1932