25. गुलामी की व्यवस्था को नष्ट कर बुरे रीतिरिवाजों को तिलांजलि दो - अप्रैल 1929 चिपलून (रत्नागिरी ) - Page 170

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पैर रखने की हिम्मत की तो मुझे बंदूक की गोली से भून दिया जाएगा, इस तरह के धमकी भरे पत्र मुझे मिले हैं। इन धमकियों से यदि मैं भयभीत होकर घर बैठ गया, तो आज आप लोगों के सामने मैं गर्दन ऊंची कर, सीना तान कर खड़ा ही ना हो पाता। किन्तु केवल तुम्हारी वजह से मेरे सामने कोई और विकल्प नहीं है।

कोंकण अंचल सारी दुनियां में भिखारी हैं, यह बात मैं भली-भांति जानता हूं। यह अंचल बौद्धिकता से सम्पन्न किन्तु आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। खोत, ब्राह्मण और मराठा आदि लोगों को भी इस कोंकण अंचल में सुख का लाभ होना असंभव है। व्यापार, उद्योग की और यदि हम ध्यान दें तो इस आपदा से हमें छुटकारा मिल सकता है। खोत, जमींदारों के अत्याचारों से जिन्हें मुक्त होना है, उन्हें मैं सिंध और इन्दौर जैसे प्रांत में खेती करने के लिए खेती की जमीन उपलब्ध कराने का भरसक प्रयास करूंगा। जीवनयापन और आर्थिक तंगी की समस्या को हल करने के लिए अफ्रीका आदि देशों में जाकर वहां व्यापार कर धनवान बने मुसलमानों का उदाहरण अपनी नजरों के, दृष्टि के सामने रखें। अपना गांव, अपने पुरखों की जगह, अपना अंचल को छोड़ कहीं दूसरी जगह जा बसने के विचार मात्र से ही मन को बेहद पीड़ा होती है। किन्तु अपनी सामाजिक हैसियत में बढ़ोतरी करने के लिए इस मार्ग को स्वीकार आप लोगों ने अवश्य ही करना चाहिए। मृत्त पशु का मांस खाना, अमंगल कार्य को करना आदि बातों को, दृढ़ संकल्प होकर, दृढ़ इच्छा शक्ति से छोड़ना होगा, उसे नकारना होगा। मेरे आज के इस संदेश में निहित बातों पर आप गंभीरता से गौर करें और आज ही स्वाभिमान और इज्जत के साथ जीने का संकल्प लेकर और उज्ज्वल जीवन जीने की कसम खाकर प्रत्यक्ष रूप से कार्य में जुट जाएं। आज के इस नवयुग में कोई भी गुलाम नहीं है, यह बात ध्यान में रखें।