26. आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का कोई पर्याय नहीं - अप्रैल 1929 चिपलून (रत्नागिरी ) - Page 172

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को उनकी मेहनत का फल दिला दे। इंसान के जीवन और संपिŸा की रक्षा करना सरकार का आद्य कर्त्तव्य है। और ऐसे मामले में सरकार ने अगर गरीबों के भले के प्रति चिंतित न हो तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह सरकार प्रगतिशील सरकार है। रत्नागिरी जिले में एक जुलमी खोत अपने अधिकार का इस्तेमाल महिलाओं की इज्जत पर हाथ डालने के लिए भी करता है। किसान वर्ग आज खोती पद्धति के कारण गुलामी में दबा जा रहा है। सŸा का दुरुपयोग न्याय-नीति के अनुसार है, ऐसा कहना कैसे सही हो सकता है! अंग्रेजों के राज में जो गुलामी चल रही है, वह सरकार को निकम्मा साबित कर रही है। अन्याय के साथ किसी भी समाज में शांति का निर्माण नहीं होगा। शांति बरकरार रखनी हो तो सरकार को न्याय करना होगा। न्याय करने वाली सरकार अगर इतने समय तक खोती की पद्धति को चलने देती है, तो वह अन्यायकारी है। सरकारी जंगलों पर खोत (जमींदार) अपने अधिकार की तानाशाही चलाएं और किसानों पर बिना वजह अत्याचार करें, यह क्या चल रहा है, यही समझ में नहीं आता। अगर शांतिपूर्ण तरीके से सोचा जाए तो खोती की पद्धति ही सदोष है। छोटी-मोटी चिल्लपों, शिकायत, समस्या कभी सरकार के कानों तक पहुंचती ही नहीं। आप अपना आंदोलन बड़े धीरज के साथ जारी रखें। अपने ऊपर हो रहे अन्यायों के बारे में आवाज उठाते हुए विरोधकों के साथ हमेशा भिड़ते रहने से ही चार-पांच सालों में स्वराज के लिए पोषक हक मिलेंगे। आज तक आंदोलन करते हुए सरकार से विनती करनी पड़ती थी। लेकिन अब चार-पांच सालों के बाद पूर्ण स्वराज स्थापित होगा। अपने प्रांत के प्रतिनिधियों को कौंसिल में भेजते समय बहुत ध्यान रखिए। चाहे जो हो, किसीसे बिना डरे, अपने विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति को ही कौंसिल में भेजें. अच्छी तरह जांच-परख कर अपना प्रतिनिधि चुनें। खोत या उसके नाते-रिश्तेदारों को वोट देकर कौंसिल में कदापि ना भेजें। समाज का जीवन पराधीन है, इसलिए एक-दूसरे पर निर्भर रहने के अलावा कोई चारा नहीं है। कुणबी लोग अपने स्वाभिमान के साथ रहें और ऊंचे लोगों के हलके काम कर अपने सामाजिक दरजे में कमी न आने दें। आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान के साथ अपना काम पूरी जोर (लगन) लगा कर करते समय एकता से चले और संगठन बनाएं। इस तरह एकता के साथ निर्मित संगठनों के आंदोलनों से अपनी शिकायतों की कौंसिल तक में सुनवाई हो सकती है। पूरे मनोबल के साथ की गई कोशिशों का असर सफलता में ही होगा इस बारे में मुझे पूरा विश्वास है।“

अध्यक्ष के भाषण के बाद सबकी सहमति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किया गया -

खोती व्यवस्था विशुद्ध गुलामी ही है। इस व्यवस्था के कारण रत्नागिरी जिले का

खेतीहर वर्ग पूरी तरह खोतों के आधीन हो गया है। इस व्यवस्था के तहत अस्थायी