26. आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का कोई पर्याय नहीं - अप्रैल 1929 चिपलून (रत्नागिरी ) - Page 173

156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तौर पर कसने के लिए पट्टे पर जमीन लेने वाले काश्तकारों की हालत तो दयनीय होती ही थी साथ ही लेन-देन की रसीदों का चलन न होने के कारण स्थायी पट्टेदारों के अधिकार भी सुरक्षित नहीं रहते थे। आर्थिक तौर पर खोती व्यवस्था काश्तकारों के लिए नुकसानदेह है। इतना ही नहीं, बल्कि नैतिक रूप से भी यह पद्धति घातक है और जोतने वाले किसानों को किसी भी प्रकार से अच्छी माली हालत प्राप्त करने की आजादी खोती पद्धति नहीं देती। ऐसी खोती व्यवस्था के प्रति यह परिषद पूरी तरह निष्ेध व्यक्त करती है और सरकार से आग्रह के साथ प्रार्थना करती है कि इस व्यवस्था को नष्ट कर दें।

इस प्रस्ताव पर श्री रगजी, श्री बेंडके के भाषण हुए। इसके अलावा कुछ अन्य फुटकर प्रस्तावों के पारित होने के बाद शाम 7 बजे के आसपास परिषद का कामकाज समाप्त हुआ। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की जय इस घोषणा के बाद धन्यवाद अर्पण, प्रकट करते हुए पान-सुपारी के बांटे जाने क बाद सभा बर्खास्त हुई।