1. जन्म आधारित श्रेष्ठता और पवित्रता के कारण गुणहीन ब्राह्मणों का भी कल्याण हुआ है - 21 और 22 मार्च 1920 माणगांव - Page 18

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जन्म आधारित श्रेष्ठता और पवित्रता के कारण गुणहीन ब्राह्मणों

का भी कल्याण हुआ है

दक्षिण भारत के बहिष्कृत वर्ग की परिषद की पहली बैठक 21 और 22 मार्च, 1920 को कागल संस्थान के माणगांव में हुई। पहले दिन चैत्र प्रतिपदा थी फिर भी सभा में लगभग पांच हजार लोग इकठ्ठा थे। इससे भी ज्यादा लोग जमा होते यदि आस-पास के कई गांवों के कुलकर्णी, तलाठी आदि लोगों ने बहिष्कृतों को यह न समझाया होता कि यह सभा धर्मांतरित लोगों की है और उसके अध्यक्ष भी धर्मांतरित ही हैं इसलिए ऐसी सभा में जाना ठीक न होगा। ऐसा भ्रमित प्रचार कर सभा के बारे में लोगों में दुष्प्रचार किया गया। सभा में कोल्हापुर दरबार के वरिष्ठ श्रेणी के और बहिष्कृतों के हितैषी लोग उपस्थित थे। कुछ ब्राह्मण भी मौजूद थे। लेकिन डिप्रेस्ड क्लास मिशन और अन्य बहिष्कृतों के लिए संघर्ष, करने वाली किसी भी संस्था का कोई मच्छर तक उपस्थित नहीं था यह बात ध्यान में रखने लायक है। पहला दिन

परिषद की कार्रवाई 21 तारीख को 5 बजे शुरू हुई। सबसे पहले स्वागत समिति के अध्यक्ष श्री दादासाहेब राजेसाहेब इनामदार का भाषण हुआ। इसमें उन्होंने त्यौहार और घरेलु समस्याओं को नजरंदाज कर इस छोटे से गांव में सभा के लिए आने के लिए प्रतिनिधियों का आभार प्रकट किया। उन्होंने आज की परिस्थिति का वर्णन कर बताया कि यह परिषद क्यों बुलाई गई है। यह बताते हुए उन्होंने अपना भाषण पूरा किया कि स्वराज्य के युग में यह सोच कर बैठे रहने के बजाय कि बाकी लोग हमारा भला करेंगे, अपने लोगों के कल्याण का महाकार्य स्वयं करना चाहिए। बाद में परंपरा के अनुसार सूचना और अनुमोदन के पश्चात् परिषद के अध्यक्ष श्री भीमराव अम्बेडकर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच स्थानापन्न हुए।

अपने भाषण में उन्होंने कहा कि,

यह परिषद् कई कारणों से अभूतपूर्व है। मुंबई क्षेत्र में इस तरह की परिषद् पहली बार हो रही है। हम लोगों में अपनी प्रगति के लिए दिखाई देने वाली तीव्र भावना भी उतनी ही अभूतपूर्व है। उसी तरह बहिष्कृत वर्ग में दिखाई देने वाली वैचारिक क्रांति भी अभूतपूर्व है। आज तक हमारे लोगों को लगता था कि हमारे दुर्भाग्य के कारण हमारी स्थिति दयनीय हुई है और दुर्भाग्य पर काबू पाना हमारे हाथ में न होने के कारण हमें इस विकट स्थिति को चुपचाप सहना चाहिए। लेकिन नई पीढ़ी अपने हालातों को ईश्वर की लीला का परिणाम नहीं मानती। वरन् दूसरों के दुष्कृत्यों का परिणाम मानती है। हम जिस हिंदू धर्म के घटक हैं, व्यवहार में उस हिंदू धर्म