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दिनांक 8 और 9 अगस्त, 1930 को परिषद का आयोजन करना तय हुआ। उसके बाद सचिव हरदास एल एन ने जो पत्रक प्रकाशित किया वह इस प्रकार था-
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के रहने का इंतजाम राज्यपाल भवन के पडोस में रहने वाले अब्दुलभाई खाकरा के बंगले में की गई थी। लेकिन डॉ. अम्बेडकर ने अकेले अलग रहने से इनकार किया। अधिवेशन में आए अन्य नेताओं के साथ ही वे रहे। इन नेताओं के लिए कॉटन मार्केट में शामियाने लगाए गए थे। वहीं उनके रहने का भी इंतजाम किया गया था। अधिवेशन व्यंकटेश थिएटर (बाद में उसका नाम श्याम थिएटर हुआ) में संपन्न हुआ।
इस परिषद के साथ सामाजिक, महिला, युवक और शिक्षा के बारे में भी अधिवेशन आयोजित किए गए थे और ये कार्यक्रम 10 अगस्त को सम्पन्न हुए। सामाजिक परिषद के अध्यक्ष पां. ना. राजभोज और स्वागताध्यक्ष दशरथ पाटील थे। महिला परिषद पुणे के सौभाग्यवती गुणाबाई गडेकर की अध्यक्षता में हुई महिला परिषद की स्वागताध्यक्षा थीं श्रीमति शेवंताबाई ओगले, अमरावती और सचिव थीं श्रीमति तुलसाबाई बनसोडे पाटील, नागपुर, श्रीमती जाईबाई चौधरी, नागपूर और श्रीमती काशीबाई मांडवघरे अकोला। युवकों की परिषद के अध्यक्ष थे लखनौ के एडवोकेट शिवदयाल सिंह चौरसिया और स्वागताध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली थी राघवेंद्रराव बोरकर जी ने।
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1930 में नागपुर में आयोजित अखिल भारतीय दलित काँग्रेस परिषद का दलित वर्ग के उत्थान के आंदोलन के इतिहास में खास राजनीतिक ऐतिहासिक महत्व है। पहली बात यह है कि भारत का समूचा अस्पृश्य समाज एक छत्र के नीचे इकट्ठे होकर अखिल भारतीय स्तर पर सम्मेलन आयोजित किया गया। दलित कॉंग्रेस का यह पहला अधिवेशन था। दूसरी बात, अस्पृश्य वर्ग के नेताओं ने डॉ. अम्बेडकर का नेतृत्व पहली बारी मान कर अपनी राजनीतिक मांगें पूरे भारत के स्तर पर एक स्वर में पहली बार ही सामने रखीं। तीसरी बात, विलायत में होने वाले गोलमेज सम्मेलन के लिए अस्पृश्य समाज के एकमात्र नेता के रूप में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को एक राय से चुना गया। चौथी बात दलित वर्ग के अखिल भारतीय संगठन की स्थापना की गई और पांचवी बात इस परिषद में बहिष्कृत वर्ग के भावी राजनीतिक जीवन की उद्देश्य और नीतियों सहित योजनाओं की नींव रखी गई। संक्षेप में इंसानियत से महरूम इस बहिष्कृत भारत के आजादी के आंदोलन के इतिहास का पहला पन्ना दलित काँग्रेस के अधिवेशन के साथ लिखा गया।