240 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यदि किसी ने मुझसे यह कहा कि, फिलहाल जो प्रणाली अस्तित्व में है और समिति द्वारा जो मिश्र पद्धति प्रस्तुत की गई है, इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करो तो मैं प्रचलित प्रणाली ही चुनूंगा। लेकिन समिति के रिपोर्ट वाला केंद्रीय सरकार का संविधान अगर टी. बी. सप्रू को मान्य होगा तो उसका विरोध करने का कोई कारण मेरे पास नहीं होगा। क्योंकि वे परिषद के मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक हैं, उसी तरह भारतीय युवाओं के प्रतिनिधि कहलाने वाले श्री जयकर और भारत के गैर-ब्राह्मणों की बात करने वाले श्री ए. पी. पात्रो यदि इस संविधान से खुश हों तो मैं भी उसका विरोध नहीं करूंगा। आज मेरी स्थिति इस प्रकार की है कि उस संविधान का मैं विरोध भी नहीं करता और उस संविधान को मैं मान्यता भी नहीं देता। जिन्हें उसे प्रत्यक्ष लागू करना हैं, मैं यह मसला उन्हीं पर छोड़ता हूं।
जिनका मैं प्रतिनिधि हूं, उनकी तरफ से प्रशासन के बारे में मेरे लिए कोई आज्ञा न होने के कारण मेरे लिए इस नीति का अवलंब करना आसान हो जाता है। लेकिन मेरे लिए एक और तरह की आज्ञा जरूर दी गई है, जिसके तहत उŸारदायी शासन पद्धति का मैं विरोध ना करूं और साथ ही उŸारदायी सरकार सही मायनों में प्रातिनिधिक सरकार न हो तो उसे मान्यता न दूं। परिषद द्वारा प्रातिनिधिक सरकार के मुद्दे पर अब तक किस तरह अमल किया है, और उसे कितनी सफलता या असफलता मिली है, यह मैं जब अवलोकन करता हूं, तब मुझे घोर निराशा होती है। वोट देने का अधिकार और विभिन्न वर्गों को विधिमंडल में मिला प्रतिनिधित्व, खालिस प्रातिनिधिक प्रशासन के दो आधार स्तंभ हैं। हर कोई जानता है कि नेहरू समिति ने वयस्क मतदान पद्धति को स्वीकृति दी है। इस समिति के द्वारा संविधान का यह जो हिस्सा तैयार किया गया, उसे भारत की सभी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन प्राप्त है। मैं जब इस सम्मेलन में आया तब मैंने पाया कि मतदान के अधिकार का जहां तक सवाल था, वहां तक हमने पहले ही लड़ाई जीत ली है। लेकिन मताधिकार समिति ने मुझे पूरी तरह निराश किया। मैं इस बात से आश्चर्यचकित रहा कि नेहरू की रिपोर्ट पर जिन लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं, उन सभी की सोच केवल एक पहलु तक ही सीमित है। उनके विचार इतने एकांगी हैं कि भारत के उदारवादियों तक का इस रिपोर्ट के लिए समर्थन मिलना मुश्किल है। क्योंकि, इससे प्रांतिक विधिमंडल के लिए सिर्फ 25 प्रतिशत लोगों को ही मताधिकार मिलने वाला है। केंद्रीय विधिमंडल के लिए कितने लोगों को मताधिकार मिलने वाला है, यह अभी अनिश्चित है। लेकिन जिस प्रकार प्रांतिक सरकार प्रतिनिधिक होती जा रही है, उसे देखने के बाद केंद्रीय विधिमंडल का स्वरूप उससे अधिक प्रातिनिधिक बनेगा, इस बारे में मेरे मन में जरा भी आशा बची नहीं है। इस तरह के सीमित मताधिकारों के कारण भारत का आगामी प्रशासन सभी लोगों से संबंधित न होकर खास वर्गाधिष्ठित होगा, इस बारे में शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है।