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बहुसंख्यक जातियों और अल्पसंख्यक जातियां के बीच विधिमंडल की जगहों के बंटवारे को लेकर पेंच पैदा हो गया है यह आप सब लोग जानते ही हैं। मुझे लगता है कि, पहले जानबूझ कर लिए गए कुछ हानिकारक निर्णयों के कारण ही ये स्थितियां पैदा हुई हैं। भारत के पूर्व शासक यदि ”सबके प्रति न्याय और किसी के बारे में पक्षपात नहीं“, इस न्याय तत्त्व को अपनाकर उसके अनुसार व्यवहार करते तो मुझे यकीन है, कि ये समस्याएं हल करना उतना कठिन नहीं होता। जिनका और जैसे भी राजनीतिक इस्तेमाल करना संभव हो पाता उसके अनुसार ब्रिटिश सरकार ने योग्यता का अलग अलग मूल्य तय कर कई जातियों को राजनीति में असाधारण अधिकार प्रदान किए और दलितों को उनके न्यायपूर्ण अधिकार देने से भी इनकार कर दिया। इसमें दलितों के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ। मुझे उम्मीद थी, कि एक बार गलती से प्रस्थापित हुई पद्धति को हमेशा के लिए प्रस्थापित न किए जाने के सिद्धांत का अनुसरण करते हुए परिषद द्वारा पुराने मूल्यों का पुनर्मुल्यांकन कर दलितों को उनके अधिकारों के हिसाब से विधिमंडल में सही अनुपात में जगहें दी जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अन्य अल्पसंख्यकों की मांगों को पहले ही स्वीकृत किया गया है और उनके अनुसार स्वरूप तय किया गया है। उसमें अब केवल प्रशासन के विस्तारित होते स्वरूप और व्यवस्था के अनुसार जो योग्य हों, वे बदलाव और सुधार करने होंगे। जो बदलाव या सुधार लाने हैं उन्हें लाने के लिए पहले से रखी गई नींव में थोड़ा-सा भी बदलाव करने का किंचित-सा साहस भी कोई नहीं करेगा। दलित वर्ग की समस्या बिल्कुल अलग है। उनकी मांगें अब जाकर सुनने में आ रही हैं। इन मांगों पर अब तक गौर नहीं किया गया है और उनमें से कितनी मांगों को स्वीकार किया जाएगा, इसका मुझे अंदाजा भी नहीं है। मुझे ऐसा भी लगता है, कि स्वसुरक्षा के लिए नहीं वरन् प्रशासन और सŸा अपने वश में हो इसके लिए जो लोग रणनीति बांध रहे हैं और हमेशा प्रतिस्पर्द्धा में लगे हुए हैं, उन्हें खुश करने के लिए दलित वर्ग की असहायता का फायदा उठाते हुए शायद उनके प्रतिनिधित्व को हमेशा के लिए बलि चढ़ा दिया जाएगा, यह असंभव नहीं है।
इस दृष्टिकोण से मेरी विचारधारा को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी मुझे निभानी होगी। भावी संविधान में दलितों को दिए जाने वाले अधिकार अभी तक स्पष्ट नहीं किए गए हैं। इसीलिए, प्रांत और केंद्र सरकार को संविधान तैयार करते हुए, ब्रिटिश सरकार उसे जाहिर करे इससे पूर्व यह बात सुनिश्चिति कर लें कि जिन लोगों के हाथ में सŸा जा रही है उनके आगे दलित वर्ग के हितों और अधिकारों का वास्तव में संरक्षण हो, ऐसी शर्तें रख कर स्पष्ट समझौता करवा लेना जरूरी है। वास्तविक स्थिति की गंभीरता को ध्यान में लेते हुए मुझे आपको यह बताना जरूरी हो जाता है कि इस बात को साफ किए और सुलझाए बगैर और इस