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मुसलमानों की तरफ से सर महंमद शफी ने गांधीजी के इस कथन का विरोध किया। डॉ अम्बेडकर को भी गांधीजी के कथन को निरस्त करना पड़ा। लेकिन कहते हैं ना कि गुपचुप चिकोटी काटने वाले का हाथ दिखाई नहीं देता, लेकिन चिल्लाने वाले का मुंह जरूर दिखाई देता है! कुछ ऐसा ही यहां भी हुआ है। महात्मा गांधी सत्पुरुष हैं, अस्पृश्योद्धारक हैं, इसलिए उनका कहा हर शब्द वेदतुल्य माना जाए। उन्होंने सच कहा या झूठ कहा, अच्छी-बुरी कोई भी नीति अपनाई, तो भी उसे स्वीकारना ही चाहिए इस प्रकार जो सोचते हैं, उन्हें डॉ. बाबासाहेब का दिया भाषण कड़वा लगना स्वाभाविक है, इसमें आश्चर्य लगने जैसी कोई बात नहीं है। यहां के छोटे-बड़े सभी राष्ट्रीय अखबारों ने महात्मा गांधीजी के तार से भेजे गए भाषण प्रसिद्ध किए, लेकिन डॉ. अम्बेडकर के भाषण को समाचार पत्र में जगह न देकर उनका सिर्फ जनमत को कलुषित करने वाला सारांश देकर अपनी बदले की आग को शांत कर लिया है। आठ तारीख को डॉ. अम्बेडकर का जो भाषण प्रसिद्ध हुआ है, उसका सारांश आगे दिया जा रहा है। डॉ. अम्बेडकर ने कहा,
”कल रात की असफल बातचीत के बाद समिति के सदस्यों ने ‘अपनी कोशिशें असफल रहीं’ इस भावना के साथ एक-दूसरे से विदा ली थी। यह भी तय किया था कि आज उस बारे में बातचीत करते हुए विवाद पैदा करने वाले बिंदुओं के बारे में या मतभेदों को और गहरा करने वाली नीतियों पर कोई भाषण ना करें। इस प्रकार की बातें आपस में मोटे तौर पर तय की गई थीं। लेकिन गांधीजी का अभी का भाषण सुन कर और उनके द्वारा इस समझौते का भंग होता देखकर मुझे खेद हुआ। गांधीजी ने भाषण की शुरुआत से ही समिति के कार्य को सफलता क्यों नहीं मिलने के कारणों को अपने नजरिए से गिनाते समय कई विवादपूर्ण पहलु उत्पन्न किए। समिति का कार्य असफल क्यों रहा, इसके कई सबूत मेरे पास भी हैं, लेकिन आज यहां उनका जिक्र करना अप्रासंगिक होगा। इसीलिए, मैं ऐसा नहीं करना चाहता।
समिति की बैठक क्या बेमियाद टाल दी जानी चाहिए, इस समयोचित विषय पर बोलने के बजाय समिति के सदस्य उन-उन समाज के प्रतिनिधि हैं अथवा नहीं हैं, का अप्रासंगिक विवादित मुद्दा बेवजह उठा कर गांधीजी ने अलग ही विषय को बढ़ावा दिया है। सरकार ने हमें यहां चुन कर भेजा है, इस बात से हम में से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। लेकिन अगर मेरे ही बारे में बोलना हो तो गांधीजी को मैं चुनौतिपूर्ण तरीके से बताना चाहता हूं कि अपना प्रतिनिधि कौन हो यह चुनने का मौका अगर अस्पृश्य वर्ग को दिया जाए तो उनके द्वारा चुने गए सदस्यों में मेरा नाम भी होगा ही। इसलिए, गांधीजी द्वारा बेवजह उछाले गए मुद्दे का जवाब देते हुए आज मैं बस इतना ही बताना चाहूंगा कि मेरा चुनाव भी सरकार द्वारा अन्य