45. अपने लोगों के हितसंबंधों का मैं खुद प्रतिनिधि हूँ - अक्तूबर 1931 लंदन - Page 281

264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लोगों की तरह ही किया गया है, लेकिन मैं अपने लोगों के हित का पूरा और सच्चा प्रतिनिधि हूं और अच्छा होगा कि वे इस सच्चाई को ना भूलें।

गांधीजी बार-बार यही बात कहते रहे हैं कि काँग्रेस अस्पृश्यों के लिए मेहनत कर रही है और अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व मैं और मेरे सहयोगियों से अधिक काँग्रेस के पास जाने की ज्यादा संभावना है! इस बारे में मैं बस इतना ही कह सकता हूं कि गैरजिम्मेदार लोगों से जो कई जाली हकों की बात उछाली जाती है उन्हीं में से ये भी जाली हक हैं और जिनके नाम से ये जाली हक रखे जाते हैं, वे अस्पृश्य लोगों द्वारा बार-बार इनकार किए जाने के बावजूद फिर-फिर वही बातें आगे रखने की परले दर्जे की बदमाशी है।

कुगन, अलमोडा से अस्पृश्य समाज संघ के अध्यक्ष द्वारा भेजा गया एक तार अभी-अभी मुझे प्राप्त हुआ है, जिसमें अस्पृश्य समाज को कांग्रेस के बारे में जो अविश्वास महसूस होता है, वह व्यक्त हो रहा है। मैंने अभी तक वह जगह नहीं देखी और न तार भेजने वाले से मेरी पहचान है। हालांकि उन्होंने लिखा है कि, काँग्रेस के कुछ लोगों के मन में अस्पृश्यों के बारे में सहानुभूति है लेकिन बहुजन अस्पृश्य समाज काँग्रेस के साथ नहीं है, यह बात बिल्कुल सही है।

हालांकि इस मुद्दे पर चर्चा करने का भी मौका नहीं है। अब जिस मुद्दे पर बोलना तय हुआ है उसके बारे में यानी, माइनॉरिटी समिति की बैठक बेमियादी रूप से रद्द कर दी जानी चाहिए, इस महात्मा गांधी के प्रस्ताव का सर म. शफी की तरह मैं भी पूरी तरह विरोध करता हूं। इस महत्वपूर्ण मसले को बीच में ही छोड़ कर किसी दूसरे मसले पर सोचा जाए यह बात मुझे पसंद नहीं है। पहली बात, कि एक और बार कोशिश कर अल्पसंख्यकों के इस माजरे को हमें आपस में ही सुलझा लेना चाहिए और सुलह कर लेनी चाहिए। और अगर यह असंभव लग रहा हो, तो ब्रिटिश सरकार पहले इस मसले को हल करने का कोई उपाय लागू करे और फिर आगे बढ़ा जाए। हालांकि, यह बात भी सही है कि किसी पराए देश के लोगों के हाथ में यह मसला सुलझाने के लिए दिया नहीं जाना चाहिए। क्योंकि, इस मामले में ब्रिटिश सरकार जितनी जिम्मेदारी किसी और अजनबी को महसूस नहीं होगी।

एक और बात की ओर मैं लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि अंग्रेज लोगों के हाथ से सŸा की बागडोर लेकर, ब्रिटिश नौकरशाही के बजाय वरिष्ठ वर्ग हिंदी स्वराज्य वालों के हाथ में उसे सौंपने के राजनीतिक आंदोलन में अस्पृश्य समाज ने अब तक हिस्सा नहीं लिया है। अंग्रेज राज के बारे में राज्यकर्ताओं के खिलाफ अस्पृश्यों की कुछ शिकायतें हैं, लेकिन सिर्फ इतने भर के लिए राजनीतिक सŸा की अदला-बदली होनी चाहिए, ऐसी अस्पृश्य लोगों की मांग नहीं है। सिर्फ राजनीतिक सŸा की अदला-बदली के लिए वे ज्यादा उत्सुक नहीं हैं। हालांकि जो लोग इस