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डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपने तथा राव बहादुर आर. श्रीनिवासन के हस्ताक्षर के साथ अछूतों के खास प्रतिनिधित्व के लिए एक आवेदन अलग से समिति के सामने पेश किया था। ख्2,
अछूतों की मांगों के बारे में महात्मा गांधी की भूमिका को जनता के सामने स्पष्ट करने के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने लंदन से 13 नवंबर, 1931 को जो खत भेजा था उसमें लिखा था -
”हिंदुस्तान के राष्ट्रीय अखबारों ने मेरे खिलाफ जो जहर उगलने और गलतफहमियाँ फैलाने की मुहिम छेड़ रखी है उसके कई चुनिंदा नमूने मुझ तक पहुंच चुके हैं। उनमें से कुछ मैंने पढ़ कर भी देखे हैं। खुद को सत्य के पक्षधर और अहिंसा के मार्ग पर चलाने का दावा करने वाले इन लोगों का सत्य प्रेम सच्चा और नेक है ऐसी गलतफहमी मुझे कभी भी नहीं थी। इसीलिए, विपरीत और सच-झूठ की छानबीन किए बगैर उन्होंने जो कुछ लिखा है उसे पढ़ कर मुझे अचरज भी नहीं लगा और मैं निराश भी नहीं हुआ................
ऐसा नहीं कि गांधीजी केवल अछूतों को अलग मतदाता संघ न मिले यह नहीं चाहते थे, गांधीजी तो यह भी नहीं चाहते थे कि अछूतों को अलग प्रतिनिधित्व मिले। अछूत हिंदू हैं और इसीलिए उनके लिए अलग आरक्षित जगहों वगैरेह की कानूनन व्यवस्था किए जाने की भी जरूरत नहीं है यह गांधीजी का पक्का दुराग्रह था। अछूतों के बारे में गांधीजी का विरोध जिस हद का था उसके अनुसार वह तय कर चुके थे कि भले मेरी गर्दन कट जाए, लेकिन हिंदुओं से अलग अछूतों को कोई हक मिले ऐसा मैं होने नहीं दूंगा। अछूतों को लेकर गांधीजी का जो विरोध था इस तरह का था। लेकिन वह कहते यही रहे थे कि इसमें अछूतों का आत्मघात है और यही वजह है कि मैं इसका विरोध कर रहा हूं। इस तरह की बातें कह कर वह अपने प्राणांतिक विरोध का दुनिया के सामने समर्थन कर रहे हैं। और ऊपर से इसमें अछूतों का ही आत्मघात हैए इसीलिए मैं विरोध कर रहा हूं . कहते हुए अपने इस जानलेवा विरोध का वे समर्थन भी कर रहे हैं यही वास्तविक स्थिति है। गांधीजी के विरोध का यह स्वरूप ठीक से जान लेने के बाद आज जो दो-चार अछूत नेता मेरे विरोध में हैं वे भी अपना विरोध छोड़ देंगे। इससे मन ही मन गांधीजी भले खुश हो जाएं लेकिन उनके दुराग्रह के बारे में मैं इतना ही कहूंगा कि अछूतों का कल्याण-अकल्याण उनके जैसे सवर्ण से अधिक मुझ जैसे अछूत को ही ज्यादा अच्छी तरह से समझ में
- तत्रैव पृष्ठ 669