302 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आएगा। अपना यही मत व्यक्त करते हुए मैं सभी स्वाभिमानी अछूत जनता के हृदय की बात व्यक्त कर रहा हूं इसका मुझे विश्वास है।“ ख्1,
”अल्पसंख्यकों के सवाल पर सर्व सहमति से कोई निर्णय नहीं हो रहा यह बात ध्यान में आते ही ब्रिटिश मुख्य प्रधान मैकडोनल्ड ने प्रस्ताव रखा कि अल्पसंख्यकों के सवाल पर निर्णय के लिए मुख्य प्रधान को समिति के सदस्य सर्वसहमति से लवाद चुनें और वह जो न्याय करेगा उसे हम स्वीकार करेंगे इस अर्थ को व्यक्त करने वाला लिखित निवेदन दें। मुख्य प्रधान से न्याय की गुहार करने वाले इस लिखित निवेदन पर अन्य सदस्यों की तरह गांधीजी ने भी हस्ताक्षर किए। लेकिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का अपनी मांगों पर इतना अटल विश्वास था कि उन्होंने इस निवेदन पर हस्ताक्षर नहीं किए।“ ख्2,
इस बारे में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपना स्पष्टीकरण प्रकाशित किया है-
| vE | Col2 | Col3 |
|---|---|---|
| vE | csM |
| d | k |
|---|
| [k | qy |
|---|
| [k | qyk |
|---|
”जैसे कि पहले ही बताया गया था निजी अल्पसंख्यक उप-समिति की कोशिशें असफल रहीं और इस कारण अल्पसंख्यकों के मुद्दे से करीब से जुड़ी पार्टी द्वारा इस मसले का हल हो पाना असंभव है ऐसा ही सबको लगने लगा। इस पराजय की
खोज में कई लोग लगे हुए हैं। पिछले हफ्ते हुई खुली बैठक में गांधीजी ने स्पष्ट रूप से अपने मतानुसार सुलह न हो पाने के कारण बताएं। अल्पसंख्यक वर्ग के प्रतिनिधि और स्वयं प्रधानमंत्री की तरफ से गांधीजी की सोच का सही-सही जवाब दिया गया। इसमें कोई शक नहीं कि गांधीजी ने जो कारण बताए उनके अलावा भी कई बातें हैं जो सुलह के लिए घातक सिद्ध हुईं। हालांकि, सबसे घातक थी खुद गांधीजी की कुछ जातियों के बारे में कलुषित बुद्धि तथा अलग-अलग जातियों में भेदभाव करने की उनकी प्रवृŸा। खास कर अपनी अध्यक्षता में बुलाई जा रही निजी समिति में दलित वर्गों के बारे में उन्होंने जो नीति अपनाई, उसकी तरफ मैं जनता का ध्यान दिलाना चाहता हूं।
अल्पसंख्यक के नाते हम दो मांगें रख रहे हैं - जिंदा रहने की आजादी और अपनी संपिŸा की रक्षा हो इसके लिए हमें मूलभूत अधिकार मिलें और साथ ही अछूत का कलंक दूर करने का विश्वास दिलाया जाए यह हमारी पहली मांग है। दूसरी मांग है विधिमंडल से या कार्यकारी सभा से हमारे हकों को नुकसान न पहुंचे इसलिए विधान
- जनता : 5 दिसम्बर, 1931
2 डॉ. अम्बेडकर : लाइफ एंड मिशन : धनंजय कीर, पुनःप्रकाशन 1981, पृष्ठ 190