118 12/13.2.1938 आजादी, समता, बंधुभाव पर आधारित नई पद्धति श्रमिक संगठनों का लक्ष्य हो - मानमाड़ - Page 111

90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वर्गों के आचार और विचारों को नियंत्रित करता है। इस बारे में भी दो राय नहीं हो सकती कि ब्राह्मणवाद कुछ विशिष्ट वर्गों को विशिष्ट अधिकार देता है। कुछ अन्य वर्गों को वह समान मौके देने से भी कतराती है। सहभोजन और दूसरी जाति में विवाह का हक हो जैसे सामाजिक हदों तक ही केवल इस ब्राह्मणवाद का बुरा असर सीमित नहीं है।

इतना ही अगर होता तो उसकी ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन बात केवल इतनी ही नहीं है। सामाजिक हकों से अलग नागरी हकों तक उसकी व्याप्ति फैली है। सार्वजनिक स्कूलों, सार्वजनिक कुओं, सार्वजनिक वाहनों, सार्वजनिक विश्रामस्थलों का इस्तेमाल करना आदि नागरी हकों के दायरे में आने वाले मसले हैं। सामाजिक फंड से खड़ी की गई या सार्वजनिक फंड को इस्तेमाल कर चलाई जाने वाली हर बात सभी नागरिकों द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए खुली होना जरूरी है। लेकिन ऐसे करोड़ों लोग हैं जिन्हें इन अधिकारों से वंचित रखा जाता है। इस देश में हजारों सालों से बेलगाम छूटे और बिजली के जिंदा प्रवाह की तरह कार्यरत ब्राह्मणवाद का यह प्रभाव है। क्या आपमें से किसी के मन में इस बारे में कोई शक है? ब्राह्मणवाद इतना सर्वव्यापी है कि आर्थिक मौके के क्षेत्रों पर भी उसका प्रभाव है। दलित वर्ग के श्रमिकों का उदाहरण लीजिए। अन्य वर्गों के कामगारों के साथ उनकी तुलना करके देखिए। सोचिए कि, रोजगार पाने के कौन से दरवाजे उसके लिए खुले हैं? नौकरी में सुरक्षितता और तरक्की के संदर्भ में उसका भविष्य क्या होगा? यह बात भी कुप्रसिद्ध है कि अस्पृश्य होने के कारण कई उद्यम उसके लिए वर्जित हैं। इस संदर्भ में कपड़ा मिलों की बातें कुप्रसिद्ध हैं। मुझे ठीक से पता नहीं है कि भारत के अन्य हिस्सों में क्या-क्या होता है लेकिन इतना निश्चित तौर पर जानता हूं कि मुम्बई इलाके के मुम्बई और अहमदाबाद के कपड़ा मिलों में बनाई विभागों के दरवाजे दलितों के लिए बंद हैं। केवल सूत कातने के विभाग में ही वे काम कर सकते हैं। इस विभाग में तनख्वाहें सबसे कम है। उन्हें बुनाई विभाग में इसलिए प्रवेश नहीं क्योंकि वे अस्पृश्य हैं। अन्य हिन्दू कामगार मुसलमान कामगारों के साथ काम करने के लिए भले तैयार हों, वे अस्पृश्य कामगारों के साथ काम करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं।

रेलवे का उदाहरण लीजिए। रेलवे के दलित कामगारों की क्या हालत है? इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि वे वहां केवल गैंगमन का काम ही कर सकते हैं। जिंदगी भर वह गैंगमेन का काम करता रहता है, उसकी तरक्की की उसे कोई उम्मीद नहीं होती। उसके लिए ऊंचे दर्जे का कोई पद खुला नहीं। अपवादस्वरूप ही किसी को पोर्टर बनाया जाता है। वह भी इसलिए क्योंकि पोर्टर के नाते उसे स्टेशन मास्टर के घर के काम भी अपनी नौकरी का एक हिस्सा मान कर करने होते हैं। स्टेशन मास्टर अक्सर उच्च वर्णीय हिन्दु होता है। ऐसे में, पोर्टर अगर अस्पृश्य हो तो उच्च वर्णीय स्टेशनमास्टर के घर में वह कैसे काम कर सकता है? लिहाजा, स्टेशनमास्टर दलित वर्ग के व्यक्ति को