118 12/13.2.1938 आजादी, समता, बंधुभाव पर आधारित नई पद्धति श्रमिक संगठनों का लक्ष्य हो - मानमाड़ - Page 112

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पोर्टर नियुक्त करने से बचता है। रेलवे में क्लर्क के पद के लिए योग्यता साबित करने वाली कोई परीक्षा नहीं ली जाती। ज्यादातर मैट्रिक की परीक्षा में अनुर्त्तीण लोगों की ही इस पद पर नियुक्ति की जाती है। भारत के ईसाई, एंगलो इंडियन और उच्च वर्ग के हिन्दुओं में से सैंकड़ों नॉन मैट्रिक लोगों को रेलवे में क्लर्क नियुक्त किया गया है। लेकिन दलित वर्ग के सैंकड़ों बच्चों को इस पद के लिए बड़ी चालाकी से नियुक्त नहीं किया जाता। कभी-कभार ही किसी को यह मौका मिलता है। यही हाल रेलवे वर्कशॉप का भी है। वहां मैकेनिक के पद पर दलित व्यक्ति की नियुक्ति अपवाद स्वरूप ही होती है। मिस्त्री के पद की भी यही बात है, दलित वर्ग के व्यक्ति को यह पद मिला हो ऐसा मुश्किल से ही दिखाई देता है। वर्कशॉप में फोरमेन या चार्जमन का पद भी उसे मुश्किल से ही मिलता है। वह केवल हमाल ही है और हमाल ही रहता है। रेलवे में दलित वर्ग का यह हाल है। जिस किसी उद्योग में उसकी योग्यता के अनुसार काम मिलने की उम्मीद होती हैं वहां उसे निम्नतम पदों पर ही नियुक्ति मिलती है और जीवनपर्यंत उसी पद तक उसे सीमित रखा जाता है। कोई पदोन्नति नहीं, उत्कर्ष, प्रगति की उम्मीद नहीं और शायद कोई बढ़ोत्तरी भी नहीं। कामगारों की मांग जब तक नहीं घटती तब तक उसके साथ यही सब होता है। लेकिन अगर कामगारों की मांग घटती है तो सबसे पहले गाज उसी पर गिरता है। उसी हड़काया जाता है कि नौकरी पाने में उसका आखरी क्रमांक है।

आपके और मेरे उद्देश्यों को कटघरे में खड़े करने वाले आलोचकों से मैं दो सवाल पूछना चाहता हूं। हमारी ये शिकायतें सही हैं या गलत हैं? और दूसरा सवाल यह कि, अगर ये सब सही है तो इससे मुक्ति पाने के लिए क्या उन्हें संगठित नहीं होना चाहिए? इन दो सवालों के जवाब अगर ‘हां’ में हों, और कोई भी ईमानदार व्यक्ति इसका कोई दूसरा जवाब दे ही नहीं सकता, तो क्या हमारी ये कोशिशें न्यायपूर्ण नहीं हैं? हम पर इल्जाम लगाने वाले कामगार नेताओं को भ्रम हुआ है। कार्ल मार्क्स पढ़ने से वे यह जान चुके हैं कि समाज में कामगार और मालिक केवल यही दो वर्ग हैं। मार्क्स को पढ़ कर वे केवल इसी बात को पकड़ कर बैठ जाते हैं कि भारत में केवल मालिक और नौकर यही दो वर्ग हैं और वे पूंजीवाद को नष्ट करने की मुहिम छेड़ देते हैं। इस नजरिए में मोटे तौर पर दो गलतियां हैं जो बात संभव है या आदर्श है उसे वास्तव में मानने की पहली गलती वे करते हैं। मार्क्स ने कहीं यह नहीं कहा कि समाज में नौकर और मालिक यही दो वर्ग होते हैं। समाज के सभी लोग पैसों को अहमियत देने वाले, बुद्धिवादी अथवा न्यायप्रिय होते हैं यह कहना जैसे गलत है उसी प्रकार यह समझना भी गलत है कि समाज में केवल दो ही वर्ग होते हैं। अर्थप्रवृत्ति इंसान का मूलभूत गुणगान कर निष्कर्ष निकालते समय अर्थविज्ञानी हमेशा एक समझदारी की सूचना देते हैं वह यह कि अगर अन्य सभी स्थितियां समान हों तो इंसान की अर्थप्रवृत्ति स्पष्ट रूप से अस्तित्व में रहती है। श्रमिक नेता यह बुनियादी बात ही भूल गए। मार्क्स ने जो बताया वह यूरोप के बारे में सच था यह मानना भी गलत है। ‘‘क्या जर्मनी में गरीब