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आगे भी हमारा समर्थन जारी रहेगा। हमारी कुछ राजनीतिक मांगे हैं। हम उनके बारे में आग्रही हैं। वे पूरी होंगी ही। लेकिन हमारी मांगें पूरी करने की शर्त रखे बिना हमने सरकार को इस मुद्दे पर समर्थन दिया है। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि अपनी मांगों को हम युद्ध की सफलता से कम महत्वपूर्ण मानते हैं। युद्ध संबंधी मामले में समर्थन देते हुए हमने अपनी ओर से कोई शर्त इसलिए नहीं रखी क्योंकि हमें लगता है कि युद्ध की असफलता के कारण निर्माण स्थिति से अलग युद्ध की सफलता से निर्माण स्थितियां हमारे राजनीतिक मसले हल करने के हिसाब से उपकारी साबित होंगे। ये जनतंत्र और तानाशाही के बीच की लड़ाई है। वह भी उदारमतवादी कल्याणकारी तानाशाही नहीं वरन् बेहद जंगली तरीके की बर्बर तानाशाही। उसकी नींव नैतिक नहीं बल्कि वांशिक उद्धतता है। नीच नाजी तानाशाही ऐसी तानाशाही है जिसको जड़ से खत्म कर देना चाहिए। नाजीम्य के विजय से जितनी भयानक स्थितियां पैदा होंगी उतनी भयानक स्थितियां, वैसी विपत्तियां आज तक पैदा नहीं हुई हैं। भविष्य में भी शायद कोई होगी नहीं। हो सकता है हम इसे भूल जाएं लेकिन वंशाधारित इसकी बुनियाद भारतीयों के लिए ज्यादा नुकसानदेह साबित होने वाली है। यह महत्वपूर्ण और ध्यान देनेवाला मसला है। स्थितियों के बारे में अगर मेरे ख्याल सही हों तो इस दुनिया से इंसानों के बीच के आपसी संबंधों का सही पालन करवाने वाला जनतंत्र विलुप्त न हो इसका ध्यान रखना हमारा जबरदस्त कर्तव्य है ऐसा मुझे लगता है। हमारा अगर इसमें विश्वास है तो हमें उसके साथ निष्ठा से और सत्य के साथ पेश आना चाहिए। केवल जनतंत्र में विश्वास रखने भर से हमारा काम पूरा नहीं होता। हमें पक्का निश्चय करना होगा कि स्वतंत्रता, समता और बंधुभाव के तत्वों को जड़ से मिटाने वाले जनतंत्र के दुन्नन की हम किसी भी तरह से मदद नहीं करेंगे। उम्मीद है कि इस सवाल को लेकर सभी की समान राय होगी। आप अगर मुझसे सहमत हैं तो जाहिर है कि आप मेरी इस बात में मेरे साथ ही होंगे कि जनतांत्रिक संस्कृति की जड़ की रक्षा के लिए अन्य जनतांत्रिक देशों के साथ मिल कर हमें कोशिश करनी चाहिए। जनतंत्र अगर जीवित रहा तो हमें उसके फल जरूर मिलेंगे। जनतंत्र की अगर मौत हुई तो उसमें हमारा विनाश है इसमें कोई आशंका नहीं।
इस अवसर पर बताने लायक और कुछ नहीं है मैं खुश हूं कि मुझे आपसे मिलने का मौका मिला। भूत की तरह ही भविष्य में भी अगर आपकी सेवा का मौका मिले तो
खुशी होगी। आप सबने मिल कर मेहनत की और अगर हम सब लोग मिल कर अगर जोरदार कोशिश करते हैं तो हमें असफलता का मुंह ताकना नहीं पड़ेगा। क्योंकि हमारा काम न्यायपूर्ण और मानव के लिए हितकारी है। ख्4,
- डॉ. अम्बेडकरांची भाषणे, संपादक- मा. फ. गांजरे, खंड 1, पुनर्मुद्रण 1986 पृष्ठ 80-92