लोक सेवाएं
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प्रांतीय सिविल सेवा
उच्च सेवा अधीनस्थ सेवा लिपिकीय चतुर्थ श्रेणी
सेवा (मीनियन)
सेवा
वर्तमान आई.सी.एस. वर्तमान प्रांतीय
और शाही सेवाओं के सेवाओं के समकक्ष
समकक्ष प्रथम श्रेणी द्वितीय श्रेणी
प्रांतीय सिविल सेवा में भरती के लिए एजेंसी : जब भारत मंत्री के पास प्रांतीय सिविल सेवा की भरती का काम नहीं रहेगा, तो भरती से संबंधित मामलों का प्रभार किस एजेंसी पर होगा, यह अगला विचारणीय प्रश्न है। मैं स्वीकार करता हूँ कि सिविल सेवा ऐसी हो कि वह राजनीतिक प्रभाव और भ्रष्टाचार के दुष्प्रभावों से मुक्त हो। अतः उसकी भरती और नियंत्रण का काम ऐसे प्राधिकरण के पास हो जिस पर मंत्रियों का नियंत्रण न हो। लेकिन मैं यह कहने के लिए तैयार नहीं कि इस प्रकार के कार्यभार के लिए प्रांतीय सिविल सेवा कमीशन का गठन किया जा सकता है। आर्थिक दृष्टि से ही यह प्रस्ताव बहुत भारी भरकम लगता है। मैं इस सुझाव से सहमत हूँ कि सेवा संबंधी मामलों पर खास तौर पर विचार के लिए हर प्रांत में एक पूर्णकालिक अधिकारी होना चाहिए। वह लोक सेवा आयोग और स्थानीय सरकार के बीच सम्पर्क अधिकारी का कार्य करे।
सेवाओं का भारतीयकरण
( I ) भारतीयों की भरती : भारतीयकरण के तर्क को इलिंगटन आयोग ने 1915 में स्वीकार कर लिया था। सुधारों की सफलता के साथ इसके संबंधों पर संयुक्त प्रतिवेदन तैयार करने वालों ने बल दिया और विभिन्न सेवाओं में भारतीयों और यूरोपीयों के बीच अनुपात का निर्धारण ली आयोग ने किया और उसे कार्य रूप दिया। इसलिए भारतीयकरण के मामले पर नए सिरे से तर्क करने की कोई आवश्यकता नहीं। यह बताना जरूरी है कि इलिंगस आयोग और ली आयोग के गठन के अंतराल में इस प्रश्न पर दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल गया था। इलिंगटन आयोग के सामने यह प्रश्न था ‘‘लोक सेवाओं में कितने भारतीयों को भरती किया जाए?’’ ली आयोग के सामने प्रश्न था कि कम से कम कितने अंग्रेजों को अब भी भरती करना ही होगा? मुझे खुशी है कि ली आयोग ने इस नए दृष्टिकोण को पूर्ण मान्यता दी। अब जरूरी यह है कि भारतीयों तथा यूरोपीयों के अनुपात को निश्चित करने के लिए ली आयोग ने जो सिद्धान्त अपनाए थे, उनमें जरूरी परिवर्तन किए जाएं ताकि भारतीयकरण की गति को तेज किया जा